Haryana News: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामलों में एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन अवार्ड को लागू कराने या उसके निष्पादन (एक्जीक्यूशन) की कार्यवाही केवल उसी स्थान तक सीमित नहीं है जहां मूल रूप से अवार्ड पारित हुआ था। अदालत ने अपने इस फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि निर्णय के खिलाफ ऋण चुकाने वाले पक्ष (ऋणी) की संपत्तियां या बैंक खाते देश के किसी अन्य हिस्से या स्थान पर मौजूद हैं, तो वहां की सक्षम अदालत में भी निष्पादन याचिका दायर की जा सकती है। जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी की एकल पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए चंडीगढ़ की अदालत में चल रही एक्जीक्यूशन कार्यवाही को पूरी तरह वैध ठहराया है।
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विवाद की मुख्य वजह और अदालती कार्यवाही
यह पूरा कानूनी विवाद केंद्र सरकार और ‘एम एस त्रिवेणी कंस्ट्रक्शन’ के बीच अनुबंध के उल्लंघन से उपजा था। इस मामले की मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) की प्रक्रिया पटना में संपन्न हुई थी, जिसके बाद 3 मार्च 2025 को कंपनी के पक्ष में आर्बिट्रेशन अवार्ड पारित किया गया था। इस अवार्ड के खिलाफ केंद्र सरकार ने पटना की जिला अदालत में मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत आपत्तियां दर्ज कराई थीं, जिन पर कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई अभी भी लंबित है।
इस बीच, एम एस त्रिवेणी कंस्ट्रक्शन ने अवार्ड के निष्पादन और अपनी बकाया राशि की वसूली के लिए चंडीगढ़ की अतिरिक्त जिला अदालत में एक्जीक्यूशन याचिका दायर कर दी। केंद्र सरकार ने इस पर आपत्ति जताते हुए अदालत के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) को चुनौती दी और दलील दी कि चूंकि रक्षा मंत्रालय के मुख्य खाते और संबंधित संपत्तियां पटना में स्थित हैं, इसलिए चंडीगढ़ की अदालत को इस मामले में एक्जीक्यूशन की कार्रवाई करने का कोई कानूनी अधिकार क्षेत्र नहीं है।
दोनों पक्षों की दलीलें और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकीलों ने जोर देकर कहा कि स्थानीय क्षेत्राधिकार के नियमों के अनुसार निष्पादन केवल पटना में ही संभव है। इसके विपरीत, त्रिवेणी कंस्ट्रक्शन के कानूनी प्रतिनिधियों ने कोर्ट के समक्ष यह तर्क दिया कि रक्षा मंत्रालय के बैंक खाते और संपत्तियां केवल पटना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे चंडीगढ़ में भी मौजूद हैं। इसलिए, चंडीगढ़ अदालत में यह एक्जीक्यूशन याचिका दायर करना पूरी तरह से कानून के अनुकूल और वैध है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण और पूर्ववर्ती निर्णयों का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आर्बिट्रेशन अवार्ड पारंपरिक रूप से किसी विशेष सिविल अदालत की मूल डिक्री के समान नहीं होता है, बल्कि कानून के तहत इसे उस अदालत की डिक्री माना जाता है जहां इसका निष्पादन किया जाना है। अदालत ने माना कि देश में जहां कहीं भी ऋणी पक्ष की संपत्तियां या बैंक खाते उपलब्ध हों, वहां अवार्ड का निष्पादन कराया जा सकता है।
निष्कर्ष और फैसले का प्रभाव
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर मुहर लगाई कि चूंकि चंडीगढ़ में केंद्र सरकार की संपत्तियां और बैंक खाते भौतिक रूप से मौजूद हैं, इसलिए वहां एग्जीक्यूशन याचिका दायर करना पूरी तरह से विधिसम्मत है। इन ठोस कानूनी निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर दिया। इस फैसले से मध्यस्थता मामलों में न्याय पाने की प्रक्रिया और अधिक सरल होगी तथा पीड़ित पक्षों को अपनी बकाया राशि वसूलने के लिए देश के अन्य हिस्सों में मौजूद संपत्तियों का लाभ उठाने का स्पष्ट कानूनी मार्ग मिल जाएगा।
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