Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पुरुषों द्वारा एक से अधिक विवाह (बहुविवाह) करने की प्रथा को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका पर कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इस याचिका में मांग की गई है कि पहली पत्नी के जीवित और वैवाहिक रिश्ते में रहते हुए दूसरी शादी करने की प्रथा को कानूनी रूप से शून्य और दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। साथ ही, मुस्लिम समाज में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे निजी मामलों से जुड़े कानूनों को जेंडर न्यूट्रल (लिंग-निरपेक्ष) बनाने की जोरदार वकालत की गई है।
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याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलीलें और कानूनी आधार
यह जनहित याचिका देश के जाने-माने महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों—ज़किया सोमन, डॉ. नूरजहाँ सफिया नियाज़, जावेद आनंद, शमसुद्दीन मोहिद्दीन तांबोली और बदर सईद द्वारा संयुक्त रूप से दाखिल की गई है। याचिका में ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीअत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ की धारा 2 की संवैधानिकता को सीधे तौर पर चुनौती दी गई है। यह धारा विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ के इस्तेमाल की अनुमति देती है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 82 के तहत एक से अधिक विवाह करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे में मुस्लिम पुरुषों को चार विवाह करने की अनुमति देना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। यह प्रथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार) का प्रत्यक्ष उल्लंघन करती है।
धार्मिक स्वतंत्रता और वैश्विक मिसालों का हवाला
याचिका में शीर्ष अदालत के पूर्व फैसलों और अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का भी हवाला दिया गया है। ‘खुर्शीद अहमद खान बनाम उत्तर प्रदेश’ मामले का जिक्र करते हुए कहा गया है कि बहुविवाह को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। कुरान में बहुविवाह की अनुमति ऐतिहासिक कालखंड में अनाथों और विधवाओं की सुरक्षा के लिए दी गई थी, जिसके साथ यह कड़ी शर्त थी कि सभी पत्नियों के साथ समान न्याय हो, जो कि मानवीय रूप से असंभव है। इसी तर्क के आधार पर तुर्की, मिस्र, ट्यूनीशिया और मोरक्को जैसे कई इस्लामिक देशों ने भी बहुविवाह पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रखा है या इसे कड़ाई से नियंत्रित किया है।
सर्वे के आंकड़े और कोर्ट की अगली कार्रवाई
याचिका में ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ (BMMA) द्वारा किए गए एक व्यापक सर्वे का भी जिक्र किया गया है। 2,500 मुस्लिम महिलाओं पर आधारित इस सर्वे के अनुसार, लगभग 88% दूसरे विवाह पहली पत्नी की जानकारी या सहमति के बिना किए जाते हैं, और 54% मामलों में पहली पत्नी को बिना सहारे के छोड़ दिया जाता है। सर्वे में शामिल 85% महिलाओं ने इस प्रथा पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित किया जाए, विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य किया जाए, तथा एक न्यायपूर्ण मुस्लिम पर्सनल लॉ तैयार करने के निर्देश दिए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार का औपचारिक जवाब सामने आने के बाद ही इस बहुप्रतीक्षित मामले पर आगे की सुनवाई की जाएगी।
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