Real Estate News: बिल्डरों को सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, पजेशन के बाद भी देना पड़ सकता है मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने घर खरीदारों के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि फ्लैट का कब्जा (possession) लेने के बाद भी खरीदार देरी के लिए बिल्डरों के खिलाफ मुआवजा मांग सकते हैं।

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Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जून 27, 2026

Real Estate News: रियल एस्टेट क्षेत्र में घर खरीदारों के लिए एक बेहद राहत भरी खबर आई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी घर खरीदार ने फ्लैट का कब्जा ले लिया है, तो भी वह बिल्डर या रियल एस्टेट कंपनी के खिलाफ ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) के लिए कानूनी शिकायत दर्ज कर सकता है। कोर्ट ने साफ कहा है कि कब्जा मिलने का मतलब यह नहीं है कि खरीदार का मुआवजा पाने का कानूनी अधिकार समाप्त हो गया है।

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क्या था सुप्रीम कोर्ट का निर्णय?

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के एक पुराने आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है। एनसीडीआरसी ने अपने आदेश में तर्क दिया था कि एक बार फ्लैट का कब्जा लेने के बाद, घर खरीदार ‘उपभोक्ता’ (Consumer) की श्रेणी में नहीं आता है और इसलिए वह देरी के लिए मुआवजे की मांग नहीं कर सकता।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि फ्लैट का कब्जा लेना और मुआवजे का दावा करना दो अलग-अलग विषय हैं। पीठ ने टिप्पणी की, “कब्जा मिल जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि देरी के लिए मुआवजे का अधिकार भी खत्म हो गया है। मुआवजे का दावा तो उस समय से जुड़ा है जब बिल्डर ने समय पर कब्जा नहीं सौंपा था।”

आर्बिट्रेशन क्लॉज भी खरीदार को नहीं रोक सकता

इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू ‘आर्बिट्रेशन क्लॉज’ से जुड़ा है। अक्सर बिल्डर एग्रीमेंट में ऐसी शर्तें जोड़ देते हैं कि किसी भी विवाद की स्थिति में खरीदार कोर्ट नहीं जा सकता और उसे केवल मध्यस्थता (Arbitration) का रास्ता चुनना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एग्रीमेंट में मौजूद ऐसी कोई भी शर्त खरीदार को उपभोक्ता फोरम (Consumer Forum) में जाने से नहीं रोक सकती। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत खरीदार का फोरम में शिकायत करना एक वैधानिक अधिकार है।

दो दशक पुराना मामला और न्याय की उम्मीद

यह फैसला एनसीआर के द्वारका स्थित एक हाउसिंग प्रोजेक्ट के मामले में आया है, जहां खरीदार ने 22 साल पहले फ्लैट पाने के लिए याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने खरीदार की 2005 में जिला उपभोक्ता फोरम में दायर शिकायत को पुनः बहाल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने जिला फोरम को निर्देश दिया है कि वे एक साल के भीतर इस मामले की जांच करें और तय करें कि प्रोजेक्ट में वास्तव में कितनी देरी हुई थी और उस देरी के लिए कितना मुआवजा दिया जाना चाहिए।

घर खरीदारों के लिए क्या है संदेश?

यह फैसला उन हजारों घर खरीदारों के लिए एक बड़ी जीत है जो बिल्डरों की मनमानी और देरी से जूझ रहे हैं। अक्सर बिल्डर कब्जा देने के समय खरीदारों पर दबाव बनाते हैं कि वे ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ या ‘देरी का दावा न करने’ का शपथ पत्र साइन करें। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख ऐसे तमाम दबावों और बिल्डरों की दलीलों को कमजोर करता है। अब कोई भी बिल्डर केवल कब्जा सौंपकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ पाएगा। यह फैसला न केवल न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि रियल एस्टेट कंपनियों में जवाबदेही तय करने के लिए एक मिसाल बनेगा।

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