PM Modi On Muharram: मुहर्रम पर पीएम मोदी ने शेयर किया पोस्ट, इमाम हुसैन की कुर्बानी का किया जिक्र

मुहर्रम के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) के बलिदान को याद करते हुए एक प्रेरणादायक संदेश दिया।

PM Modi On Muharram

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जून 26, 2026

PM Modi On Muharram: मुहर्रम का महीना न केवल इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए त्याग, बलिदान और अन्याय के विरुद्ध अडिग रहने का एक संदेश लेकर आता है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने संदेश में हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी को याद करते हुए लिखा कि यह बलिदान आज भी लोगों को सच्चाई और इंसाफ के रास्ते पर डटे रहने की प्रेरणा देता है। उनके अनुसार, इमाम हुसैन का बलिदान हिम्मत और मजबूत विश्वास की एक ऐसी शक्ति है, जो सदियों से मानवता का मार्गदर्शन कर रही है।

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61 हिजरी: एक संघर्ष जो इतिहास बन गया

यह घटना 61 हिजरी की है। उस समय यजीद इब्ने मुआविया सत्ता पर काबिज था और वह इस्लाम के मूल स्वरूप को बदलकर अपनी मनमर्जी चलाना चाहता था। यजीद चाहता था कि इमाम हुसैन (अ.स.) उसकी अधीनता स्वीकार कर लें, जिससे उसके अन्यायपूर्ण फैसलों को भी वैधता मिल सके। इमाम हुसैन (अ.स.) ने यह भांप लिया था कि यदि उन्होंने गलत के सामने घुटने टेक दिए, तो सच्चाई सदा के लिए मिट जाएगी और मजलूमों को कभी न्याय नहीं मिलेगा। उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय बलिदान का कठिन रास्ता चुना।

कर्बला का रण

2 मुहर्रम को इमाम हुसैन (अ.स.) का छोटा सा काफिला, जिसमें केवल 72 वफादार साथी थे, कर्बला के मैदान में पहुंचा। उनके साथ बुजुर्ग, युवा और छोटे बच्चे भी थे। यजीद की विशाल सेना ने उन्हें घेर लिया और 7 मुहर्रम से उनके खेमे का पानी तक रोक दिया गया। कर्बला की तपती रेत पर मासूम बच्ची सकीना (स.अ.) और 6 महीने के अली असगर की प्यास ने इतिहास की सबसे मार्मिक गाथा लिखी। हर तरफ ‘प्यास’ का आलम था, लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों का हौसला अडिग रहा।

आशूरा का दिन

10 मुहर्रम, जिसे ‘आशूरा’ कहा जाता है, उस दिन एक-एक कर इमाम हुसैन (अ.स.) के साथियों ने सच्चाई की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। हजरत कासिम, हजरत अली अकबर और हजरत अब्बास (अ.स.) जैसे वीरों की शहादत ने यह सिद्ध कर दिया कि हक की राह में जान देना सबसे बड़ी जीत है। अंत में इमाम हुसैन (अ.स.) अकेले बचे और उन्होंने भी खुद को शहादत के लिए पेश कर दिया।

प्रेरणा और शिक्षा

मुहर्रम का महीना पूरी दुनिया में गम और सब्र के साथ मनाया जाता है। लोग काले कपड़े पहनते हैं, मजलिसों का आयोजन करते हैं और मातम मनाकर उस महान बलिदान को याद करते हैं। इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह अत्याचार के सामने सिर न झुकाने का एक शाश्वत सबक है। उन्होंने यह सिखाया कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, सच्चाई का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

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