Health Tips: आजकल सोशल मीडिया पर फिटनेस से जुड़े कई नए ट्रेंड्स तेजी से वायरल होते रहते हैं। इन दिनों ऐसा ही एक नया तरीका चर्चा में है, जिसे ‘लिंफैटिक वॉकिंग’ (Lymphatic Walking) कहा जा रहा है। इस ट्रेंड के तहत यह दावा किया जा रहा है कि रोजाना केवल 10 मिनट तक एक खास तरीके से वॉक करने से शरीर की सूजन और ब्लोटिंग (पेट फूलने की समस्या) को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। सामान्य तौर पर की जाने वाली सैर से यह थोड़ी अलग होती है, क्योंकि इसमें चलने की गति, शरीर के पॉश्चर और सांस लेने के तरीकों पर खास ध्यान दिया जाता है। लेकिन क्या यह तरीका वाकई इतना चमत्कारी है या फिर यह सिर्फ सोशल मीडिया का एक और नया ट्रेंड बनकर रह जाएगा? आइए विस्तार से समझते हैं।
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लिंफैटिक सिस्टम और सूजन का कनेक्शन
हमारे शरीर में जिस प्रकार ब्लड सर्कुलेशन के लिए खून बहता है, ठीक उसी तरह ‘लिंफ’ (Lymph) नाम का एक तरल पदार्थ भी मौजूद होता है। इस फ्लूइड का मुख्य काम शरीर के विभिन्न हिस्सों से अतिरिक्त तरल पदार्थों और जहरीले कचरे (वेस्ट मटीरियल) को बाहर निकालना है।
दिल पूरे शरीर में खून को पंप करने का काम करता है, लेकिन लिंफैटिक सिस्टम के पास अपना कोई पंपिंग ऑर्गन नहीं होता है। यह सिस्टम मुख्य रूप से मांसपेशियों के सिकुड़ने और सांस लेने की नेचुरल प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ता है। यही मुख्य वजह है कि जो लोग ऑफिस में या घरों में लंबे समय तक एक ही जगह पर लगातार बैठे रहते हैं, उनके शरीर में फ्लूइड टिश्यू के अंदर जमा होने लगता है। इसी कारण से शरीर में सूजन, भारीपन और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं महसूस होने लगती हैं।
चलने से शरीर को क्या फायदे मिलते हैं?

जब कोई व्यक्ति पैदल चलता है, तो उसके पैरों और पूरे शरीर की मांसपेशियां लगातार सिकुड़ती और फैलती हैं। इस गतिविधि से लिंफ फ्लूइड को शरीर में आगे बढ़ने और सर्कुलेट होने में काफी मदद मिलती है। विभिन्न हेल्थ रिसर्च में भी यह बात सामने आ चुकी है कि हल्की-फुल्की एक्सरसाइज या वॉक करने के दौरान लिंफ का बहाव, आराम करने की स्थिति के मुकाबले कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए, जो लोग घंटों अपनी डेस्क पर बैठे रहते हैं, उनके लिए बीच-बीच में उठकर थोड़ी देर टहलना पैरों की सूजन को कम करने में बेहद मददगार साबित होता है।
आखिर क्या है इस 10 मिनट की खास वॉक का सच?

लिंफैटिक वॉकिंग के नाम पर जो तरीके बताए जा रहे हैं, उनमें सामान्य वॉक की तुलना में पॉश्चर एकदम सीधा रखने, गहरी और नियमित सांस लेने तथा हाथों को स्वाभाविक तरीके से गति देने पर जोर दिया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने से शरीर की मांसपेशियों का मूवमेंट बेहतर होता है, जिससे लिंफ फ्लूइड को सही दिशा में आगे बढ़ने में सहायता मिलती है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस बात के कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं हैं कि सिर्फ पॉश्चर या सांस लेने के स्टाइल में बदलाव करने से लिंफ का बहाव सामान्य वॉक की तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। मांसपेशियों का सिकुड़ना और सांस लेना—यह प्राकृतिक प्रक्रिया तो हर तरह की वॉक में लगभग एक जैसी ही होती है।
हल्का महसूस होना यानी फैट लॉस नहीं, बल्कि फ्लूइड का बदलाव
अक्सर लोग इस तरह की वॉक के बाद शरीर में हल्कापन महसूस होने पर इसे वजन घटने से जोड़ लेते हैं। लेकिन एक्सपर्ट्स साफ तौर पर स्पष्ट करते हैं कि वॉक के तुरंत बाद जो हल्कापन महसूस होता है, वह ज्यादातर मामलों में शरीर में जमा हुए एक्स्ट्रा फ्लूइड या पानी के बाहर निकलने की वजह से होता है, न कि फैट कम होने के कारण।
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