Karnataka News: कर्नाटक में कारगिल युद्ध के एक पूर्व सैनिक से जुड़ा मामला सरकारी व्यवस्था और लंबे समय से लंबित वादों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। 1999 के कारगिल युद्ध में हिस्सा लेने वाले सेवानिवृत्त सैनिक शिवानंद रेड्डी ने कथित तौर पर आत्महत्या की कोशिश की है। बताया जा रहा है कि वह लंबे समय से सरकार की ओर से किए गए जमीन आवंटन के वादे को पूरा कराने के लिए अधिकारियों, नेताओं और मंत्रियों के कार्यालयों के चक्कर लगा रहे थे।
शिवानंद रेड्डी ने कथित तौर पर कीटनाशक पीकर अपनी जान देने की कोशिश की। उनकी हालत गंभीर बताई जा रही है और एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है। आत्मघाती कदम उठाने से पहले उन्होंने प्रशासन को एक भावुक पत्र भी लिखा था, जिसमें उन्होंने अपनी पीड़ा और वर्षों से लंबित जमीन के मामले का जिक्र किया।
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डिप्टी सीएम से मिलने की कोशिश
जानकारी के मुताबिक, यह घटना 29 अगस्त के आसपास की बताई जा रही है। शिवानंद रेड्डी कर्नाटक के डिप्टी सीएम जी. परमेश्वर से मिलकर अपनी समस्या उनके सामने रखना चाहते थे। उनका उद्देश्य सरकार की ओर से किए गए जमीन आवंटन के वादे को पूरा कराने के लिए मदद मांगना था।हालांकि, आरोप है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उन्हें डिप्टी सीएम से मिलने की अनुमति नहीं दी। लंबे समय से अपनी मांग को लेकर प्रयास कर रहे पूर्व सैनिक के लिए यह स्थिति कथित तौर पर बेहद निराशाजनक रही।
सेवा के सम्मान में जमीन देने का था वादा
शिवानंद रेड्डी भारतीय सेना की मराठा लाइट इन्फैंट्री में नायक के पद पर सेवा दे चुके हैं। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वह घायल हुए थे और युद्ध में लगी चोटों के कारण दिव्यांग भी हो गए। उनकी सैन्य सेवा और बलिदान के सम्मान में कर्नाटक के चिक्कबल्लापुर जिले के चिंतामणि क्षेत्र में जमीन आवंटित किए जाने का वादा किया गया था। लेकिन 26 साल से ज्यादा समय गुजर जाने के बावजूद यह वादा पूरा नहीं हो सका।
दो हेक्टेयर जमीन के लिए लगातार लगा रहे थे गुहार
इस साल की शुरुआत में शिवानंद रेड्डी ने चिंतामणि के तहसीलदार को पत्र लिखकर दो हेक्टेयर जमीन आवंटित करने की मांग की थी। उन्होंने शिकायत की थी कि इतने लंबे समय से आवेदन लंबित होने के बावजूद प्रशासन उनकी मांग पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सका। अपने पत्र में उन्होंने सवाल उठाया था कि एक दिव्यांग पूर्व सैनिक के लिए जमीन की पहचान करने में आखिर 26 साल क्यों लग गए। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने देश की सेवा की, लेकिन अपने हक के लिए उन्हें वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े।
‘क्या देश की सेवा करना मेरी गलती थी?’
पूर्व सैनिक के पत्र में उनकी निराशा साफ नजर आई। उन्होंने सवाल किया कि क्या भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा करना उनकी गलती थी। उन्होंने प्रशासन से पहले से चिन्हित उपयुक्त जमीन का आवंटन करने की अपील की थी। रेड्डी ने अधिकारियों को चेतावनी भी दी थी कि यदि उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया गया और कोई अप्रिय घटना होती है तो इसके लिए संबंधित अधिकारी जिम्मेदार होंगे।
गंभीर हालत के कारण बयान नहीं हो सका दर्ज
पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, चिकित्सकों ने अभी तक शिवानंद रेड्डी को बयान देने के लिए फिट घोषित नहीं किया है। इसी वजह से उनका आधिकारिक बयान दर्ज नहीं किया जा सका है। शिवानंद रेड्डी वर्ष 1987 में सेना में शामिल हुए थे। कारगिल युद्ध में घायल होने के बाद भी उन्होंने अपने अधिकार के लिए वर्षों तक प्रशासन से गुहार लगाई। अब उनके आत्मघाती कदम ने लंबित सरकारी वादों, पूर्व सैनिकों के सम्मान और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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