Haryana News: भूमि अधिग्रहण पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, दशकों पुराने विवाद अब नहीं होंगे बहाल

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वर्षों पहले अंतिम रूप से निस्तारित हो चुके भूमि अधिग्रहण मामलों को 2013 के नए कानून की धारा 24(2) का हवाला देकर दोबारा नहीं खोला जा सकता।

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Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जुलाई 30, 2026

Haryana News: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मामलों से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन भूमि अधिग्रहण के मामलों का वर्षों पहले पूरी तरह से अंतिम निस्तारण हो चुका है, उन्हें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (LARR Act, 2013) की धारा 24(2) का सहारा लेकर दोबारा नहीं खोला जा सकता। अदालत की खंडपीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया या कानून का मूल उद्देश्य पहले से समाप्त हो चुके पुराने विवादों को अनिश्चितकाल तक जिंदा रखना नहीं है। यह फैसला उन तमाम मामलों में राहत देने वाला है जो लंबे समय से कानूनी पेचीदाओं में अटके हुए थे।

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क्या है पूरा मामला और अदालत की टिप्पणी?

यह फैसला जस्टिस विकास बहल और जस्टिस सुभाष मेहला की खंडपीठ ने हरियाणा के झज्जर जिले के बहादुरगढ़ क्षेत्र से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2016 में अपनी 1 बीघा 12 बिस्वा भूमि के अधिग्रहण को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इस जमीन का अधिग्रहण आवासीय, वाणिज्यिक और विभिन्न संस्थागत सेक्टरों के सुनियोजित विकास के लिए किया जाना था।

अदालत ने पाया कि इस पूरी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया की शुरुआत वर्ष 2002-03 में पुराने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत की गई थी और इसके तहत 25 जून 2004 को ही आधिकारिक तौर पर अवार्ड पारित किया जा चुका था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि उनकी जमीन का वास्तविक और वैधानिक कब्जा सरकार द्वारा नहीं लिया गया है, इसलिए इस पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया को निरस्त कर देना चाहिए।

दशकों पुराने मामलों को फिर से जीवित करने पर रोक

खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि वर्ष 2013 का नया कानून लागू होने के बाद से अदालतों में ऐसे मामलों की बाढ़ आ गई है, जिनमें भू-स्वामियों ने दशकों पुराने मामलों को धारा 24(2) के जरिए दोबारा चुनौती देनी शुरू कर दी है। कई मामलों में स्थिति यह थी कि या तो उन पर पहले ही कोर्ट की पुरानी याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं या फिर समय पर अधिग्रहण को कभी चुनौती ही नहीं दी गई थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक देरी से दायर की जाने वाली ऐसी याचिकाओं के माध्यम से उन मुद्दों को उठाने का प्रयास किया जाता है जो कानूनी रूप से बहुत पहले समाप्त हो चुके हैं। यदि इस प्रकार की पुरानी याचिकाओं और दावों को बार-बार स्वीकार किया जाने लगा, तो देश में कोई भी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया कभी भी अपने अंतिम दौर या अंजाम तक नहीं पहुंच पाएगी। इसके परिणामस्वरूप सरकार की महत्वपूर्ण सार्वजनिक विकास परियोजनाएं, बुनियादी ढांचा और जनहित के कार्य लंबे समय तक बाधित होते रहेंगे।

याचिका खारिज और भविष्य के लिए कड़ा संदेश

इन सभी महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं, तथ्यों और सबूतों पर गहराई से विचार करने के बाद हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि बहादुरगढ़ से जुड़ी यह वर्तमान याचिका भी अत्यधिक देरी (Inordinate Delay) से दायर की गई थी और इसमें कोई भी मजबूत कानूनी आधार नहीं बनता है। अदालत ने इस याचिका को पूरी तरह से निराधार और गुण-दोष रहित करार देते हुए खारिज कर दिया। हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल प्रशासनिक और विकास कार्यों को गति देगा, बल्कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े पुराने और बेवजह के मुकदमों पर भी प्रभावी रोक लगाएगा।

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