Live-in Relationship Law: इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, ‘शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिश्ता अपराध नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समाज की सोच को किनारे रखते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि अगर एक शादीशुदा पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ सहमति से लिव-इन में रहता है, तो यह अपराध नहीं है। क्या यह फैसला भारतीय विवाह संस्था की नींव हिला देगा या व्यक्तिगत आजादी की जीत है?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 27, 2026

Live-in Relationship Law: लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ उसकी आपसी सहमति से लिव-इन में रहता है, तो इसे कानून की नजर में अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि “नैतिकता” और “कानून” दो अलग-अलग विषय हैं। अदालत का मानना है कि केवल सामाजिक मान्यताओं या नैतिकता के आधार पर किसी बालिग जोड़े पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि उन्होंने किसी स्थापित कानून का उल्लंघन न किया हो।

याचिकाकर्ता जोड़े की गिरफ्तारी पर रोक और सुरक्षा का आदेश

यह आदेश अनामिका और नेत्रपाल द्वारा दायर की गई एक क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया। कोर्ट ने न केवल याचिकाकर्ता जोड़े की गिरफ्तारी पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है, बल्कि शाहजहांपुर पुलिस को उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने का भी निर्देश दिया है। अदालत ने महिला (अनामिका) के परिजनों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वे इस जोड़े को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाएंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिवार का कोई भी सदस्य न तो उनके घर में प्रवेश करेगा और न ही फोन या किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से उन्हें परेशान करने की कोशिश करेगा।

पुलिस कप्तान की जिम्मेदारी और ‘शक्ति वाहिनी’ केस का हवाला

सुरक्षा के मसले पर हाईकोर्ट ने शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया है। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में ‘शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के तहत बालिग जोड़ों की सुरक्षा करना पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य है। कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की प्रति 24 घंटे के भीतर संबंधित अधिकारियों को भेजें। इस मामले की अगली सुनवाई अब 8 अप्रैल को होनी तय हुई है। बता दें कि यह विवाद शाहजहांपुर के जैतीपुर थाने में दर्ज एक एफआईआर से शुरू हुआ था, जहाँ मां ने बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप लगाया था।

अदालत में दलीलें: बालिग होने का प्रमाण और विवाह का तर्क

सुनवाई के दौरान अनामिका और नेत्रपाल ने कोर्ट को बताया कि वे दोनों कानूनी रूप से बालिग हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि मां द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में भी अनामिका की उम्र 18 साल बताई गई थी, जिससे उसके बालिग होने की पुष्टि हुई। हालांकि, विरोधी पक्ष के वकील ने यह तर्क दिया कि चूंकि नेत्रपाल पहले से शादीशुदा है, इसलिए उसका किसी अन्य महिला के साथ रहना अवैध है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि दो बालिगों के आपसी सहमति से साथ रहने पर केवल इस आधार पर केस दर्ज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अब प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है।

ऑनर किलिंग का भय और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल

याचिकाकर्ता अनामिका ने पहले ही पुलिस प्रशासन को लिखित रूप में सूचित किया था कि उसे अपने माता-पिता से जान का खतरा है और वे ‘ऑनर किलिंग’ (सम्मान के नाम पर हत्या) कर सकते हैं। कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी व्यक्त की कि पुलिस कप्तान ने इतनी गंभीर शिकायत मिलने के बावजूद सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अदालत ने कहा कि जब कोई बालिग नागरिक अपनी जान को खतरा बताता है, तो प्रशासन की ढिलाई अक्षम्य है। यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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