UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए बीता रविवार ‘सुपर संडे’ के रूप में दर्ज हो गया, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार एवं कैबिनेट फेरबदल संपन्न किया। राजभवन के भव्य प्रांगण में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कुल आठ नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस संवैधानिक कोटा और मंत्रिपरिषद की अधिकतम सीमा के तहत अब योगी सरकार में मुख्यमंत्री सहित कुल 60 सदस्य हो चुके हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब सरकार में किसी भी नए चेहरे के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा है और मंत्रिमंडल का ‘हाउस फुल’ बोर्ड लग चुका है।
सोशल इंजीनियरिंग का मास्टर स्ट्रोक
भाजपा ने इस विस्तार के माध्यम से जातीय समीकरण और सोशल इंजीनियरिंग की बिसात बिछाने की सफल कोशिश की है। शपथ लेने वाले आठ मंत्रियों में से पांच पिछड़े वर्ग (OBC), दो दलित और एक ब्राह्मण चेहरे को शामिल कर वोट बैंक की घेराबंदी एवं चुनावी रणनीति को धार दी गई है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी और सपा के बागी रहे मनोज कुमार पांडे को सीधे कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं, अजीत सिंह पाल और सोमेंद्र तोमर को पदोन्नत कर राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया है। कृष्णा पासवान इस विस्तार का एकमात्र महिला चेहरा रहीं, जिससे दलित महिला मतदाताओं को साधने का प्रयास साफ दिखाई दे रहा है।
प्रतीक भूषण का पत्ता कटा
इस कैबिनेट विस्तार में सबसे अधिक चर्चा गोंडा के कद्दावर नेता बृजभूषण शरण सिंह के बेटे प्रतीक भूषण सिंह की थी। प्रतीक भूषण की दावेदारी और मंत्रिमंडल से नाम गायब होने को लेकर सियासी हलकों में काफी हैरानी जताई जा रही है। देवीपाटन मंडल में अपना मजबूत प्रभाव रखने वाले प्रतीक भूषण को मंत्री बनाए जाने की प्रबल संभावना थी, लेकिन अंतिम सूची में उन्हें स्थान नहीं मिल सका। दिलचस्प बात यह रही कि सपा से आए बागी विधायक एवं भाजपा के वफादार नेताओं के बीच चयन की इस प्रक्रिया में मनोज पांडे (कक्का) बाजी मार ले गए, जबकि प्रतीक भूषण की किस्मत का ताला इस बार भी नहीं खुला।
बृजभूषण का शायराना हमला
बेटे को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह की टीस एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सार्वजनिक हो गई। उन्होंने ‘X’ पर एक तीखा पोस्ट एवं शायराना तंज कसते हुए लिखा कि “शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है।” इस बयान को सीधे तौर पर मंत्रिमंडल विस्तार की नाराजगी और समुदाय विशेष की अनदेखी से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस पोस्ट को महज एक शायरी नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व के लिए एक चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि बृजभूषण अपने बेटे की उपेक्षा से खासे आहत हैं।
हाईकमान पर दबाव बनाने की तैयारी
मंत्रिमंडल विस्तार के तत्काल बाद बृजभूषण शरण सिंह का दिल्ली पहुंचना कई नए सियासी कयास और भविष्य की चुनौतियों की ओर इशारा कर रहा है। यद्यपि उनके दिल्ली दौरे को औपचारिक बताया जा रहा है, परंतु कयास हैं कि वे केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष उपेक्षा का मुद्दा और क्षेत्रीय दबदबा रखने वाले समर्थकों की बात रख सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गोंडा और आसपास के तराई जिलों में अपने प्रभाव का हवाला देकर वे पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं। अब देखना यह होगा कि भाजपा आलाकमान इस ‘पावर गेम’ को कैसे संभालता है।










