Rupee vs Dollar: मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य संघर्ष का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। सोमवार सुबह ट्रेडिंग शुरू होते ही भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 92.30 रुपये तक पहुंच गई, जो अब तक का रिकॉर्ड स्तर है। विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों का मानना है कि वैश्विक अस्थिरता और निवेशकों की बढ़ती चिंता के कारण भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ गया है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से बढ़ा दबाव
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल आयात करता है, इसलिए तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर रुपये पर पड़ता है। जैसे-जैसे तेल महंगा होता है, भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपये की मांग घटती और डॉलर की मांग बढ़ती है। इसी वजह से भारतीय मुद्रा लगातार कमजोर होती जा रही है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बाजार में गिरावट
वैश्विक तनाव बढ़ने के साथ ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालना शुरू कर दिया है। निवेशकों को आशंका है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसी कारण कई बड़े फंड और संस्थागत निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। विदेशी निवेशकों की इस बिकवाली का असर सीधे भारतीय शेयर बाजार और मुद्रा बाजार दोनों पर पड़ रहा है।
शेयर बाजार में भारी गिरावट
सोमवार को शेयर बाजार में भी भारी गिरावट देखने को मिली। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स लगभग 2,177.61 अंक तक लुढ़क गया, जबकि निफ्टी करीब 647.60 अंक गिर गया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, बैंकिंग, आईटी और मेटल सेक्टर के शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। कई बड़ी कंपनियों के शेयरों में भी तेज बिकवाली देखी गई, जिससे निवेशकों के बीच घबराहट का माहौल बन गया।
पहले भी 92 रुपये के पार पहुंच चुका था डॉलर
इससे पहले 4 मार्च को भी रुपये में तेज गिरावट देखी गई थी। उस दिन अमेरिकी डॉलर की कीमत पहली बार 92 रुपये के पार पहुंच गई थी और 92.17 रुपये पर कारोबार कर रही थी। अब सोमवार को यह और गिरकर 92.30 रुपये के स्तर पर पहुंच गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मौजूदा परिस्थितियां बनी रहती हैं तो आने वाले दिनों में रुपये पर और दबाव बढ़ सकता है।
युद्ध की शुरुआत और बढ़ता तनाव
मिडिल ईस्ट में मौजूदा संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी, जब अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया। इस हमले में तेहरान समेत ईरान के कई क्षेत्रों को भारी नुकसान पहुंचा। रिपोर्ट्स के अनुसार, हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की भी मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया।
ईरान का जवाबी हमला और क्षेत्रीय संकट
हमले के जवाब में ईरान ने मिडिल ईस्ट और इज़राइल में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए। कुवैत, बहरीन, ओमान, जॉर्डन, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, सीरिया और तुर्की जैसे देशों में भी कई हमलों की खबरें सामने आई हैं। इन हमलों में भारी नुकसान हुआ है और हजारों लोगों की जान जाने की आशंका जताई जा रही है।
तेल सप्लाई पर असर और वैश्विक व्यापार में जोखिम
इस युद्ध का सबसे बड़ा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा है। मिडिल ईस्ट के कई तेल उत्पादक देशों में आपूर्ति बाधित हो गई है। इसके अलावा, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक होर्मुज स्ट्रेट भी बंद होने की खबर है। इस मार्ग से होकर बड़ी मात्रा में तेल टैंकर गुजरते हैं। इसके बंद होने से वैश्विक तेल सप्लाई पर गंभीर असर पड़ सकता है।
निवेशकों की बढ़ती चिंता और बाजार में अनिश्चितता
वैश्विक व्यापार में बढ़ते जोखिम के कारण निवेशकों में अस्थिरता और चिंता बढ़ गई है। कई निवेशक फिलहाल सुरक्षित निवेश विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। यही वजह है कि शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखी जा रही है और रुपये पर भी दबाव बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक युद्ध की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।










