US Iran Tensions: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब सीधे तौर पर जुबानी जंग में तब्दील हो चुका है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बेहद विवादित बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें (ट्रंप को) कुछ भी नुकसान हुआ, तो ईरान को ‘धरती के नक्शे से मिटाया जा सकता है।’ ट्रंप की इस विनाशकारी धमकी पर ईरान ने कड़ा रुख अपनाया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के भारत में प्रतिनिधि, अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि वाशिंगटन की इस तरह की बयानबाजी का तेहरान पर कोई असर नहीं पड़ता। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि ईरान किसी भी संभावित नतीजे और चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी: ‘धमकियां जारी रहीं तो ईरान को उड़ा दिया जाएगा’
दरअसल, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को एक टीवी चैनल ‘न्यूजनेशन’ के साथ साक्षात्कार के दौरान ईरान को चेतावनी दी थी। ट्रंप का दावा है कि ईरानी नेतृत्व की ओर से उनकी हत्या की धमकियां मिल रही हैं। उन्होंने कड़े लहजे में कहा, “अगर ईरानी नेताओं की ओर से इस तरह की साजिशें जारी रहीं, तो ईरान को उड़ा दिया जाएगा।” ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि अगर उनकी सुरक्षा के साथ कोई भी खिलवाड़ हुआ, तो अमेरिका पूरे देश को नेस्तनाबूद करने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप के इस आक्रामक तेवर ने मध्य पूर्व की पहले से ही अस्थिर स्थिति को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है।
अब्दुल माजिद इलाही का इंटरव्यू: ‘ट्रंप का यह बयान कोई नया नहीं है’
न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) को दिए एक विशेष इंटरव्यू में प्रतिनिधि अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने ट्रंप की धमकियों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “ईरान के लिए अमेरिका की यह बयानबाजी कोई नई बात नहीं है। हमने दशकों से इस तरह की चेतावनियां सुनी हैं।” इलाही ने जोर देकर कहा कि ईरान की सरकार और वहां की सेना किसी भी बाहरी आक्रमण या दबाव का मुकाबला करने के लिए अपनी रक्षात्मक क्षमताओं को मजबूत किए हुए है। उनके अनुसार, अमेरिका केवल मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसका ईरान पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा।
परमाणु हथियारों पर रुख: ‘परमाणु बम बनाना इस्लाम में हराम है’
इंटरव्यू के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल का जवाब देते हुए इलाही ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने अयातुल्ला सैय्यद अली खामेनेई के एक पुराने धार्मिक आदेश (फतवा) का हवाला देते हुए कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार नहीं चाहता था क्योंकि इस्लाम में सामूहिक विनाश के हथियारों का निर्माण करना ‘हराम’ माना गया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आश्वस्त किया कि ईरान की परमाणु गतिविधियां पूरी तरह शांतिपूर्ण हैं और वे चिकित्सा उपचार, ऊर्जा उत्पादन और अन्य मानवीय जरूरतों पर केंद्रित हैं। उनके अनुसार, पश्चिमी देशों द्वारा लगाया जा रहा परमाणु हथियारों का आरोप केवल एक बहाना है।
मध्य पूर्व में स्थिरता की मांग: ‘तनाव बढ़ा तो पूरे क्षेत्र को होगा नुकसान’
इलाही ने चेतावनी दी कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता यह तनाव केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने कहा, “हम क्षेत्र में स्थिरता और शांति चाहते हैं, लेकिन कुछ ताकतें ऐसी हैं जो मध्य पूर्व को अशांत रखना चाहती हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर युद्ध जैसी स्थिति पैदा होती है, तो इसका खामियाजा पूरे मध्य पूर्व और विश्व अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ेगा। ईरान ने वैश्विक शक्तियों से इस मामले में हस्तक्षेप करने और शांति बनाए रखने की अपील की है, लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया है कि वे अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेंगे।
कूटनीतिक गतिरोध का भविष्य: क्या बातचीत से निकलेगा रास्ता?
डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में रहने के दौरान अमेरिका और ईरान के रिश्ते अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। एक तरफ जहां ट्रंप आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य धमकियों के जरिए ईरान को झुकाना चाहते हैं, वहीं ईरान अपनी ‘प्रतिरोध की नीति’ (Policy of Resistance) पर कायम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयानों से कूटनीतिक बातचीत के रास्ते बंद हो रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस तनाव को कम करने के लिए कोई प्रभावी मध्यस्थता कर पाएगा या यह जुबानी जंग भविष्य में किसी बड़े सैन्य टकराव का रूप ले लेगी।
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