पंजाब कांग्रेस चीफ बनने को लेकर खींचतान तेज

चंडीगढ़. चुनावी वर्ष से पहले ही पंजाब कांग्रेस की खींचतान सतह पर आनी शुरू हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी का अनुसूचित जाति की पार्टी में अनदेखी का आरोप लगाने का वाडियो प्रसारित होने के बाद कांग्रेस में प्रदेश प्रधान बनने को लेकर जोड़तोड़ तेज हो गई है। कारण स्पष्ट है कि 2027 का विधानसभा चुनाव जिसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा, टिकट वितरण में भी उसकी भूमिका अहम होगी। अगर उसके समर्थक ज्यादा जीतकर आए तो उसकी मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी भी मजबूत हो जाएगी। यही वजह है कि प्रधानगी हथियाने की कवायद तेज हो गई है। चन्नी

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Published On :

जनवरी 22, 2026

चंडीगढ़.

चुनावी वर्ष से पहले ही पंजाब कांग्रेस की खींचतान सतह पर आनी शुरू हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी का अनुसूचित जाति की पार्टी में अनदेखी का आरोप लगाने का वाडियो प्रसारित होने के बाद कांग्रेस में प्रदेश प्रधान बनने को लेकर जोड़तोड़ तेज हो गई है। कारण स्पष्ट है कि 2027 का विधानसभा चुनाव जिसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा, टिकट वितरण में भी उसकी भूमिका अहम होगी।

अगर उसके समर्थक ज्यादा जीतकर आए तो उसकी मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी भी मजबूत हो जाएगी। यही वजह है कि प्रधानगी हथियाने की कवायद तेज हो गई है। चन्नी ने प्रसारित वीडियो में प्रदेश प्रधान, नेता विपक्ष, संगठन महामंत्री व एनएसयूआइ के प्रधान का पद उच्च जातियों को देने को लेकर सवाल उठाया है। इसके बाद खड़े हुए विवाद से पंजाब में कांग्रेस मुश्किल में पड़ गई है।

कांग्रेस प्रधान को लेकर विवाद जारी
दरअसल, सारा विवाद प्रदेश प्रधान की कुर्सी को लेकर हैं। कांग्रेस का पिछले ढाई दशकों में इतिहास रहा है कि चुनावी वर्ष से पहले प्रधानगी की कुर्सी को लेकर खींचतान शुरू हो जाती है। विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा कई मौकों पर इस बात का जिक्र भी कर चुके हैं। कांग्रेस में 2027 का चेहरा बनने की खींचतान लंबे समय से मुख्य रूप से प्रताप सिंह बाजवा, चरणजीत सिंह चन्नी, अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और सुखजिंदर रंधावा के बीच चली आ रही है।

सीएम के चेहरे को आगे किए बिना होगा चुनाव
ऐसे में राजा वड़िंग ने इस बात पर जोर दिया कि वह 70 से 80 नए चेहरों को चुनाव मैदान में लाने के पक्ष में हैं। इसके उपरांत प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल ने यह घोषणा कर दी कि पार्टी 2022 की गलती को पुन: नहीं दोहराएगी और 2027 में कांग्रेस मुख्यमंत्री के चेहरे को आगे किए बिना ही चुनाव लड़ेगी। ऐसे में अगर चुनाव राजा वड़िंग के नेतृत्व में लड़ा गया तो उनका पलड़ा भारी हो जाएगा। चूंकि टिकट बंटवारे में प्रदेश प्रधान की अहम भूमिका रहती है। 2002 और 2017 का चुनाव कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया और कैप्टन ही मुख्यमंत्री बने। दोनों ही बार कैप्टन ने पार्टी की कमान संभालने के लिए लंबी जद्दोजहद की थी।

अनायास नहीं था चन्नी का बयान
2015 में तो उन्होंने प्रताप सिंह बाजवा को प्रधान पद से हटाने के लिए लंबी डिप्लोमेसी की। पार्टी सूत्र बताते हैं कि चन्नी द्वारा ‘अपर कास्ट’ को लेकर दिया गया बयान अनायास नहीं था। बघेल द्वारा 2022 की गलती दोबारा नहीं दोहराने के बयान के बाद से ही चन्नी के समर्थन में जट और गैर जट नेताओं ने लाबिंग करनी शुरू कर दी है।

चन्नी के समर्थन में 31 जट नेताओं ने तो हाईकमान को पत्र लिख कर समय भी मांग लिया है। हालांकि हाईकमान की तरफ से अभी तक इन नेताओं को मिलने का समय नहीं दिया है। पार्टी अगर चरण जीत सिंह चन्नी को चेहरा बनाकर 2027 का चुनाव लड़ेगी तो उसे पहले पार्टी की कमान भी सौंपनी होगी। यही कारण है कि कांग्रेस की असली खींचतान प्रदेश प्रधान की कुर्सी को लेकर है, क्योंकि यहीं से 2027 के लिए मुख्यमंत्री का दावा मजबूत होगा।

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