Supreme Court TET verdict: शिक्षकों के लिए TET अब भी अनिवार्य, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं बदला पुराना आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2025 को आदेश दिया था कि जो शिक्षक बिना TET के नौकरी कर रहे हैं, उन्हें दो साल के भीतर यह परीक्षा पास करनी होगी। अगर वे ऐसा नहीं करते तो उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ेगी या अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया जाएगा।

Supreme Court TET verdict

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

मई 30, 2026

Supreme Court TET verdict: देशभर के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों (कक्षा 1 से 8वीं) में पढ़ा रहे शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट से एक बेहद महत्वपूर्ण खबर आई है। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि देश के सभी शिक्षकों के लिए टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) पास करना अनिवार्य रहेगा। कोर्ट ने इस अनिवार्यता को हटाने या अपने पुराने आदेश को वापस लेने से साफ मना कर दिया है। हालांकि, मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने गैर-टीईटी शिक्षकों को एक छोटी सी राहत जरूर दी है—टीईटी पास करने की समय सीमा को एक साल के लिए आगे बढ़ा दिया गया है।

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अब 31 अगस्त, 2028 तक का समय

सुप्रीम कोर्ट के इस नए फैसले के बाद अब बिना टीईटी के काम कर रहे शिक्षकों को यह परीक्षा पास करने के लिए 31 अगस्त, 2028 तक की मोहलत मिल गई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यह अंतिम अवसर है और इसके बाद समय सीमा में किसी भी प्रकार का विस्तार (Extension) नहीं किया जाएगा।

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और अच्छी शिक्षा देने के लिए शिक्षकों का योग्य और पूर्णतः प्रशिक्षित होना अनिवार्य है। राज्यों में गैर-टीईटी शिक्षकों की बड़ी तादाद और कई राज्यों द्वारा समय पर टीईटी परीक्षा का आयोजन न करा पाने की विफलता को देखते हुए ही कोर्ट ने यह एक साल की अतिरिक्त राहत दी है।

क्या था सुप्रीम कोर्ट का पिछला आदेश?

इससे पहले, 1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुनाया था। उस आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

2 साल का अल्टीमेटम: बिना टीईटी के नौकरी कर रहे सभी शिक्षकों को 2 वर्ष के भीतर यह परीक्षा पास करनी थी।

नौकरी पर संकट: परीक्षा पास न करने की स्थिति में शिक्षकों को या तो नौकरी छोड़नी पड़ती या उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) दे दी जाती।

5 वर्ष का नियम: यह नियम उन शिक्षकों पर लागू किया गया था जिनकी सेवा अवधि (नौकरी) 5 साल से अधिक बची थी।

पदोन्नति के लिए बाध्यता: जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में 5 वर्ष से कम का समय शेष था, उन्हें नौकरी बचाने के लिए तो छूट थी, लेकिन उच्च पद पर प्रमोशन (पदोन्नति) पाने के लिए उनके लिए भी टीईटी पास करना अनिवार्य था।

शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून और कोर्ट की व्याख्या

पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने एक बार फिर शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act), 2009 के प्रावधानों को दोहराया। पिछले साल जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा था कि नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) ने 29 जुलाई 2011 को ही शिक्षकों के लिए टीईटी को न्यूनतम और अनिवार्य योग्यता घोषित कर दिया था। इसलिए, बिना इस पात्रता के किसी भी व्यक्ति को शिक्षक के रूप में कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

शिक्षक संगठनों की मांग खारिज

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के शिक्षक संगठनों के साथ-साथ कुछ राज्य सरकारों ने भी सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की थीं। उनकी मुख्य मांग यह थी कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति वर्ष 2009 में आरटीई एक्ट लागू होने से पहले हुई थी, उन्हें इस परीक्षा से स्थायी छूट दी जाए।

न्यायालय ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए शिक्षकों से अपील की है कि वे अपनी सोच को केवल नौकरी बचाने तक सीमित न रखें, बल्कि देश के भविष्य यानी बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की जिम्मेदारी को प्राथमिकता दें।

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