Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने वेश्यावृत्ति और इसमें लगी महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रगतिशील निर्णय सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने स्पष्ट किया है कि वेश्यावृत्ति कर रही हर महिला को ‘मजबूर’ या ‘पीड़ित’ मान लेना और उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे पुनर्वास केंद्र (Rehabilitation Centre) में भेज देना न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि यह उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी उल्लंघन है।
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कोर्ट का रुख
जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने ‘प्रज्वला बनाम भारत सरकार’ मामले की सुनवाई करते हुए मौजूदा कानूनी ढांचे, विशेषकर ‘इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956’ की धारा 17 पर कड़ा प्रहार किया। कोर्ट ने कहा कि हमारा कानून वर्तमान में पुरुषवादी सोच से ग्रस्त है, जो हर सेक्स वर्कर को एक ही चश्मे से देखता है। यह कानून जबरन देह व्यापार में धकेली गई महिलाओं और अपनी मर्जी से इस पेशे में आई महिलाओं के बीच अंतर करने में पूरी तरह विफल रहा है। कोर्ट ने इसे ‘अव्यावहारिक’ करार देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने जब ऐसी महिलाओं को पेश किया जाता है, तो उनकी वास्तविकता और व्यक्तिगत पसंद को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है।
महिला की इच्छा और स्वतंत्रता का अधिकार
अदालत ने इस संवेदनशील विषय को महिला के जीवन, सम्मान और भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि किसी भी पुनर्वास प्रक्रिया के केंद्र में उस महिला की ‘इच्छा’ होनी चाहिए। फैसला स्पष्ट करता है कि यदि कोई वयस्क महिला स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति के पेशे में है और उसे जारी रखना चाहती है, तो राज्य या प्रशासन उसे बलपूर्वक पुनर्वास केंद्र में बंद नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा, “अगर कोई महिला स्थायी संरक्षण या पुनर्वास में नहीं जाना चाहती है, तो उसे उसकी मर्जी के खिलाफ कहीं और जाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।” यह टिप्पणी संविधान द्वारा प्रदत्त जीने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के अनुरूप है।
मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी और सावधानी
सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेटों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। महिला का बयान दर्ज करते समय मजिस्ट्रेट को अत्यंत सावधानी बरतनी होगी। मजिस्ट्रेट की प्राथमिक जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि महिला जो भी कह रही है, वह बिना किसी बाहरी दबाव, डराव या जोर-जबरदस्ती के है।
कोर्ट ने कहा कि यदि मजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि महिला का बयान पूरी तरह स्वैच्छिक है और वह अपनी मर्जी से ही इस पेशे में है, तो उसे पुनर्वास केंद्र भेजने का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए।
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