Super El Nino: दिल्ली सहित पूरा भारत इस समय भीषण गर्मी और चिलचिलाती लू की चपेट में है। हालांकि देश के कुछ राज्यों में छिटपुट वर्षा देखने को मिल रही है, लेकिन तापमान में गिरावट न होने से आम जनजीवन को कोई राहत नहीं मिल पा रही है। केरल के तट पर मॉनसून के आगमन की शुरुआती खबरों से जो उम्मीदें जगी थी, वे अब धुंधली पड़ती दिख रही हैं। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस साल मानसूनी बारिश सामान्य के मुकाबले काफी कम हो सकती है।
इसका मुख्य कारण प्रशांत महासागर में तेजी से आकार ले रहा ‘सुपर अल नीनो’ (Super El Nino Phenomenon) है, जिसे भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा काल माना जा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के साथ-साथ दुनिया भर की प्रमुख जलवायु एजेंसियों ने भी चेतावनी जारी की है कि यह मौसमी बदलाव देश में सूखे और भीषण तपिश के हालात पैदा कर सकता है।
क्या है सुपर अल नीनो का विज्ञान
जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार, सुपर अल नीनो वास्तव में सामान्य अल नीनो का ही एक अत्यंत उग्र और विनाशकारी रूप है। इस स्थिति में प्रशांत महासागर की सतह का तापमान (Pacific Ocean Surface Temperature) दीर्घकालिक औसत से कम से कम 3.6 डिग्री फ़ारेनहाइट यानी 2 डिग्री सेल्सियस तक अधिक बढ़ जाता है। जबकि सामान्य अल नीनो के दौरान यह तापमान औसत से केवल 0.9 डिग्री फ़ारेनहाइट ज्यादा रहता है। जब यह मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र अत्यधिक गर्म हो जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation Alteration) में बड़ा उलटफेर होता है।
यह बदलाव सीधे तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ने वाली दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं की गति को धीमा और कमजोर कर देता है, जिससे वर्षा का चक्र पूरी तरह टूट जाता है। वैज्ञानिकों का डर है कि साल 2026 का यह सुपर अल नीनो 1997 और 2015 की तरह ही बेहद घातक और विनाशकारी साबित हो सकता है।
अल नीनो के पिछले 70 सालों के इतिहास ने बढ़ाई टेंशन
रॉयटर्स की एक हालिया रिपोर्ट और पिछले 70 वर्षों के मौसम संबंधी ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो अल नीनो की कुल 17 घटनाओं में से केवल 5 बार ही ऐसा हुआ जब देश में औसत या उससे अधिक बारिश दर्ज की गई। इसके विपरीत, पिछले छह अल नीनो चक्रों के कारण भारत को हमेशा औसत से कम वर्षा (Deficit Monsoon Rainfall) का सामना करना पड़ा है। उदाहरण के लिए, साल 2009 में एक कमजोर अल नीनो के चलते भी भारत में भारी सूखा पड़ा था और बारिश घटकर सामान्य की तुलना में महज 78.2% रह गई थी, जो कि पिछले 37 वर्षों का सबसे निचला स्तर था। मौसम के मौजूदा कंप्यूटर मॉडल्स संकेत दे रहे हैं कि वर्ष 2026 का अल नीनो प्रभाव (2026 El Nino Impact) कहीं अधिक मजबूत और तीव्र होगा, जिसके चलते भारत में सूखे की स्थिति पहले से भी बदतर हो सकती है।
कृषि संकट से फसलों को नुकसान
भारत में होने वाली कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70% हिस्सा अकेले मॉनसून से आता है, जो देश की खेती-किसानी के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है। भारत की लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था (Indian Economic Sector) में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 18% है, जिससे देश की 1.5 अरब की आबादी में से आधी आबादी की आजीविका और पेट भरता है। सुपर अल नीनो के कारण यदि मानसूनी बारिश पर्याप्त नहीं होती है, तो खरीफ सीजन की मुख्य फसलें जैसे चावल, कपास और सोयाबीन पूरी तरह बर्बाद हो सकती हैं।
इतना ही नहीं, मिट्टी में नमी (Soil Moisture Loss) की भारी कमी के चलते रबी यानी सर्दियों की मुख्य फसलें जैसे गेहूं और सरसों की बुवाई भी बुरी तरह प्रभावित होगी। कृषि उत्पादन घटने से खाद्य निर्यात पर प्रतिबंध (Food Export Restrictions) लगाना पड़ सकता है, जैसा कि 2023 के अल नीनो के समय हुआ था जब सरकार ने ताड़ और सोया तेल के निर्यात पर रोक लगा दी थी। साथ ही, जलाशयों में पानी कम होने से जलविद्युत निर्माण में कमी (Reduction in Hydroelectric Power Generation) आएगी, जिससे देश में बिजली का भारी संकट भी गहरा सकता है।
इन राज्यों में मचेगा सूखे का हाहाकार
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुमानों के मुताबिक, साल 2026 के मध्य से यह सुपर अल नीनो दुनिया भर में मौसम के मिजाज को बुरी तरह बिगाड़ देगा। भारत के भीतर इसका सबसे विनाशकारी प्रभाव कुछ विशिष्ट राज्यों में देखने को मिलेगा:
मध्य प्रदेश के प्रमुख हिस्से: एमपी में हालात सबसे अधिक चिंताजनक हो सकते हैं। यहां इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, चंबल, जबलपुर, रीवा, शहडोल, सागर और नर्मदापुरम जैसे संभागों में भारी वर्षा की कमी (Acute Shortage of Rain) दर्ज की जा सकती है।
पंजाब, हरियाणा और राजस्थान: देश के इन प्रमुख अन्नदाता राज्यों के लिए अगस्त और सितंबर के महीने सबसे संवेदनशील रहेंगे, जहां खेतों में पानी न मिलने से सूखे जैसे हालात (Drought Like Situation) पैदा हो जाएंगे।
दिल्ली-NCR और अन्य क्षेत्र: पहले से ही लू के थपेड़ों से झुलस रही देश की राजधानी दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों को राहत नहीं मिलेगी। इसके अलावा दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक, ओडिशा, गुजरात और आंध्र प्रदेश में भी जल संकट और भीषण ताप लहर (Severe Heatwave and Dry Spell) का प्रकोप देखने को मिलेगा, जिससे न केवल भारत बल्कि पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्से भी झुलस जाएंगे।










