SC Verdict on SIR: देश में निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की विशेष मतदाता संशोधन प्रक्रिया यानी SIR (Special Intensive Revision) की वैधता को पूरी तरह चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव (Free and Fair Election) संपन्न कराने के लिए इस तरह की प्रक्रियाएं बेहद जरूरी हैं।
यह बड़ा फैसला मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की डिवीजन बेंच ने बुधवार (27 मई 2026) को सुनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कदमों में किसी भी प्रकार की संवैधानिक या कानूनी खामी नहीं है। आयोग ने देश के संविधान और कानून द्वारा दी गई अपनी शक्तियों के भीतर रहकर ही काम किया है, न कि अपनी सीमाओं से बाहर जाकर।
नाम कटने को नियम विरुद्ध नहीं कह सकते
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कई महत्वपूर्ण और कड़े रुख अपनाए। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “हमारा यह स्पष्ट मानना है कि SIR प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग द्वारा जो भी कदम उठाए गए, वे जमीनी परिस्थितियों और निष्पक्षता को बनाए रखने की जरूरत के मुताबिक थे।”
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि इस प्रक्रिया के जरिए वास्तविक नागरिकों और मतदाताओं पर खुद की नागरिकता या प्रामाणिकता साबित करने का एक अतिरिक्त और अनुचित बोझ डाला जा रहा है। कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।
पुराने निवास से अलग रहने का तर्क
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने मूल निवास स्थान को छोड़कर किसी अन्य जगह पर रह रहा है, तब भी वह इस मूल प्रक्रिया (SIR) के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं हो जाता। उसका या उसके परिवार के किसी सदस्य का नाम पुरानी सूची (या रिकॉर्ड) में अवश्य उपलब्ध होगा। इसलिए, यदि नियमों के तहत SIR में किसी का नाम कटता है, तो उसे नियम विरुद्ध या मनमाना नहीं कहा जा सकता।
क्या था पूरा विवाद और याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्तियां?
इस बेहद संवेदनशील और जटिल कानूनी मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने लंबी और विस्तृत सुनवाई करने के बाद साल 2026 की शुरुआत में ही अपना फैसला पूरी तरह सुरक्षित रख लिया था। इन याचिकाओं के माध्यम से चुनाव आयोग (Election Commission) द्वारा शुरू की गई इस विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया को सीधे अदालत में चुनौती दी गई थी।
विभिन्न सामाजिक संगठनों और याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चुनाव आयोग की यह संशोधन प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act), 1950 और उसके तहत बनाए गए स्थापित नियमों का सीधे तौर पर उल्लंघन करती है। उनका दावा था कि चुनाव आयोग अपनी विधायी शक्तियों से काफी आगे निकलकर काम कर रहा है।
2002-2003 की मतदाता सूची की शर्त पर था मुख्य विवाद
इस पूरे सियासी और कानूनी विवाद की मुख्य जड़ चुनाव आयोग द्वारा लगाई गई एक विशेष शर्त से जुड़ी हुई थी। इस शर्त के तहत, जो मतदाता साल 2002 (या कुछ संवेदनशील सीमावर्ती राज्यों में साल 2003) की आधिकारिक मतदाता सूची से बाहर रहे थे, उन्हें अब मतदाता सूची में अपना नाम दोबारा जुड़वाने या बनाए रखने के लिए अपनी प्रामाणिकता साबित करनी होगी।
इसके लिए उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अपना पैतृक संबंध (Ancestral Link) या वंशावली साबित करनी थी, जिसका नाम उस ऐतिहासिक (2002/2003) मतदाता सूची में पहले से वैध रूप से दर्ज था। याचिकाकर्ताओं को इसी क्लॉज पर सबसे ज्यादा आपत्ति थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने देशहित और निष्पक्ष चुनाव के लिए पूरी तरह सही और वैध ठहरा दिया है।
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