Sabarimala Case: धार्मिक स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम; सबरीमाला सहित कई अहम मुद्दों पर फैसला रिजर्व

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षकारों को निर्देश दिया है कि वे 29 मई तक अपने लिखित जवाब दाखिल करें, ताकि मामले पर आगे की सुनवाई और निर्णय प्रक्रिया पूरी की जा सके।

Sabarimala Case

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

मई 14, 2026

Sabarimala Case: सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े एक ऐतिहासिक कानूनी अध्याय की सुनवाई पूरी हो गई है। प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की विशाल संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। 16 दिनों तक चली इस मैराथन बहस के बाद, अदालत ने सभी पक्षों को 29 मई तक अपना लिखित जवाब दाखिल करने का समय दिया है।

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धार्मिक स्वतंत्रता बनाम संवैधानिक अधिकार

यह पूरा मामला केवल एक मंदिर में प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान के तहत मिलने वाली ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ (अनुच्छेद 25 और 26) के दायरे को परिभाषित करने की एक बड़ी कोशिश है। अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या किसी धार्मिक समुदाय की ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) महिलाओं के समानता के अधिकार का उल्लंघन कर सकती है।

इस सुनवाई के दौरान न केवल केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा उठा, बल्कि दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना (FGM) जैसी प्रथाओं और मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश जैसे व्यापक विषयों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

संविधान पीठ की संरचना

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली इस नौ सदस्यीय पीठ में कानून के क्षेत्र के दिग्गज शामिल हैं। पीठ के अन्य सदस्यों में शामिल हैं:

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार

न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह

न्यायमूर्ति प्रशांत बी. वराले

न्यायमूर्ति आर. महादेवन

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची

देश के दिग्गज वकीलों की दलीलें

16 दिनों तक चली इस कानूनी जंग में देश के सबसे बड़े संवैधानिक वकीलों ने हिस्सा लिया। मुकुल रोहतगी, अभिषेक मनु सिंघवी, गोपाल सुब्रमण्यम और राजीव धवन जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अलग-अलग पक्षों का प्रतिनिधित्व किया। वकीलों के बीच इस बात पर तीखी बहस हुई कि क्या न्यायपालिका को धर्म के ‘अभिन्न अंगों’ में हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं।

जहाँ कुछ वकीलों ने तर्क दिया कि संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज से ऊपर होनी चाहिए, वहीं दूसरी ओर कुछ ने दलील दी कि आस्था से जुड़े मामलों में अदालत का दखल सीमित होना चाहिए ताकि समुदायों की पहचान और उनकी परंपराएं सुरक्षित रह सकें।

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