Prateek Yadav Last Rites: समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के छोटे पुत्र प्रतीक यादव का निधन हो गया। 14 मई को लखनऊ के भैंसाकुंड में उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान भावुक माहौल देखने को मिला, जहां परिवार और करीबी रिश्तेदार मौजूद थे। बीजेपी नेता अपर्णा यादव के पिता अरविंद सिंह बिष्ट ने अपने दामाद को अंतिम विदाई देते हुए मुखाग्नि दी।
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ससुर द्वारा मुखाग्नि देने पर शुरू हुई चर्चा
इस घटना के बाद समाज में एक नई बहस छिड़ गई कि क्या ससुर अपने दामाद का अंतिम संस्कार कर सकता है। परंपरागत रूप से यह माना जाता है कि अंतिम संस्कार और मुखाग्नि देने का अधिकार परिवार के निकटतम पुरुष सदस्य को होता है। ऐसे में ससुर द्वारा यह भूमिका निभाने को लेकर लोगों में उत्सुकता और चर्चा बढ़ गई है।
परिवार में उत्तराधिकारी न होने की स्थिति

प्रतीक यादव की दो बेटियां हैं और कोई पुत्र नहीं है। आमतौर पर हिंदू परंपरा में पुत्र को मुखाग्नि देने का पहला अधिकार माना जाता है। लेकिन पुत्र न होने की स्थिति में परिवार के अन्य सदस्य जैसे पोता, भाई, भतीजा या निकट संबंधी यह जिम्मेदारी निभा सकते हैं। आधुनिक समय में कई मामलों में बेटियों को भी यह अधिकार दिया जाने लगा है और इसे सामाजिक रूप से स्वीकार किया जा रहा है।
धार्मिक ग्रंथों में क्या है उल्लेख
गरुड़ पुराण सहित कई हिंदू शास्त्रों में अंतिम संस्कार की परंपराओं का उल्लेख मिलता है। इनके अनुसार मुखाग्नि देने का अधिकार मुख्य रूप से पुत्र को दिया गया है। यदि पुत्र उपलब्ध न हो तो अन्य रक्त संबंधी यह कार्य कर सकते हैं। शास्त्रों में यह भी माना गया है कि यह प्रक्रिया पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य मृत आत्मा की शांति है।
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क्या ससुर दामाद को मुखाग्नि दे सकता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ससुर और दामाद के बीच रक्त संबंध नहीं होता और दोनों के गोत्र भी अलग होते हैं। इसलिए परंपरागत रूप से ससुर को दामाद का अंतिम संस्कार करने वाला प्रमुख व्यक्ति नहीं माना जाता। हालांकि, शास्त्रों में इस पर किसी प्रकार का पूर्ण निषेध भी स्पष्ट रूप से नहीं मिलता।
यदि परिवार में कोई निकट पुरुष सदस्य मौजूद न हो या विशेष परिस्थितियां उत्पन्न हों, तो ऐसी स्थिति में ससुर भी यह जिम्मेदारी निभा सकता है। आधुनिक समय में कई सामाजिक बदलावों के चलते पारिवारिक सहमति और भावनात्मक संबंधों को भी महत्व दिया जाता है।
समाज में बदलती परंपराएं और सोच
आज के समय में सामाजिक दृष्टिकोण काफी बदल रहा है। कई स्थानों पर बेटियों को भी मुखाग्नि देने का अधिकार दिया जा रहा है, जिसे अब स्वीकार्यता मिलने लगी है। परंपरा और आधुनिक सोच के बीच संतुलन बनाते हुए लोग अपने-अपने परिवार के अनुसार निर्णय ले रहे हैं।










