Pahlaj Nihalani Death: बॉलीवुड के दिग्गज फिल्म निर्माता और सेंसर बोर्ड (CBFC) के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी का आज, 4 जून 2026 को 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। वे लंबे समय से लिवर संबंधी बीमारी (लिवर सिरोसिस) से जूझ रहे थे और मुंबई के नानावटी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उनके निधन की खबर से फिल्म जगत में शोक की लहर है। वे अपने पीछे अपनी पत्नी नीता और तीन बेटों—विशाल, दीपेश और चिराग को छोड़ गए हैं। उनका अंतिम संस्कार आज दोपहर 3:00 बजे सांताक्रूज हिंदू श्मशान घाट में किया जाएगा।
2017 तक इस महत्वपूर्ण पद को संभाला
फिल्म निर्माण की दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले पहलाज निहलानी जब साल 2015 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के अध्यक्ष बने, तो किसी ने नहीं सोचा था कि उनका कार्यकाल भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक बड़े विवाद का विषय बन जाएगा। निहलानी ने 2017 तक इस महत्वपूर्ण पद को संभाला। उनके अध्यक्ष बनने के बाद बोर्ड की कार्यप्रणाली में एक बड़ा बदलाव आया। जहां एक ओर बोर्ड का काम फिल्मों को सर्टिफिकेट देना था, वहीं निहलानी के दौर में यह संस्था अपनी ‘सेंसरशिप’ की नीतियों के कारण चर्चाओं के केंद्र में रही।
फिल्मकारों के साथ बढ़ता गया मतभेद
निहलानी के अध्यक्ष कार्यकाल के दौरान फिल्मों के सर्टिफिकेशन को लेकर लिए गए फैसलों ने न केवल फिल्म उद्योग को हैरान किया, बल्कि रचनात्मक स्वतंत्रता (Creative Freedom) के मुद्दे पर एक तीखी बहस को भी जन्म दिया। उन्होंने कई फिल्मों में बड़े पैमाने पर कट्स लगाने और दृश्यों को हटाने के निर्देश दिए, जिसे फिल्म निर्देशकों ने ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर हमला माना। यह समय ऐसा था जब बोर्ड और फिल्म निर्माताओं के बीच संवाद के बजाय टकराव की स्थिति अधिक दिखाई दी। निहलानी की कार्यशैली के कारण बॉलीवुड के बड़े नामों के साथ भी उनकी खींचतान की खबरें अक्सर सुर्खियों में रहीं।
फिल्म जगत में मची खलबली
पहलाज निहलानी ने अपने पद पर रहते हुए हमेशा अपने नियमों को पूरी सख्ती से लागू करने पर जोर दिया। सेंसर बोर्ड की भूमिका को लेकर वे अडिग रहे और उनका मानना था कि फिल्मों में दिखाए जाने वाले विषयों पर बोर्ड का नियंत्रण अनिवार्य है। उनके इस दृष्टिकोण ने भारतीय सिनेमा में ‘सेंसरशिप’ की प्रक्रिया को एक कठिन डगर बना दिया था। हालांकि, फिल्म जगत के भीतर से लगातार यह मांग उठती रही कि बोर्ड को ‘सेंसर’ करने के बजाय केवल ‘प्रमाणन’ (Certification) तक सीमित रहना चाहिए, लेकिन निहलानी अपनी नीतिगत सोच पर कायम रहे।
सेंसर बोर्ड बनाम फिल्म निर्माता
सेंसर बोर्ड की कठोर नीतियों के चलते निर्देशकों और निहलानी के बीच जो बहस छिड़ी, वह सिर्फ एक कार्यकाल तक ही सीमित नहीं रही। इसे भारतीय फिल्म उद्योग में सेंसरशिप की भूमिका पर एक वैचारिक युद्ध के रूप में देखा गया। कई फिल्मकारों ने सार्वजनिक रूप से निहलानी की नीतियों का विरोध किया और इसे कला के साथ अन्याय करार दिया। इस दौरान बोर्ड की साख और उसकी कार्यप्रणाली पर भी कई सवालिया निशान लगे। यह कार्यकाल आज भी याद किया जाता है जब सेंसर बोर्ड की ‘अति-सक्रियता’ और फिल्मकारों की ‘रचनात्मक अभिव्यक्ति’ एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी थीं।
पहलाज निहलानी का कार्यकाल और उसका सिनेमाई प्रभाव
पहलाज निहलानी का यह दो साल का कार्यकाल भारतीय फिल्म उद्योग के लिए किसी रोलर-कोस्टर राइड से कम नहीं था। उन्होंने चाहे जो भी तर्क दिए हों, लेकिन उनके फैसलों ने सेंसर बोर्ड के प्रति उद्योग के नजरिए को हमेशा के लिए बदल दिया। आज जब भी भारत में सेंसरशिप या फिल्म प्रमाणन की बात होती है, तो उनके कार्यकाल को एक मिसाल के तौर पर याद किया जाता है। उन्होंने न केवल बोर्ड के नियमों को सख्ती से लागू किया, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे एक अध्यक्ष का व्यक्तिगत दृष्टिकोण पूरी फिल्म इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है।










