Odisha News : फिर शर्मसार हुई व्यवस्था, झारसुगुड़ा में पत्नी का शव बाइक पर लाया पति, स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले में एक दर्दनाक घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्नी की मौत के बाद शव वाहन न मिलने पर पति को मजबूरी में शव बाइक पर ले जाना पड़ा। आखिर अस्पताल प्रशासन ने मदद क्यों नहीं की, और सिस्टम कहां फेल हुआ, जानिए पूरी रिपोर्ट।

 Odisha News

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जुलाई 6, 2026

 Odisha News :  ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले से एक बेहद दुखद और व्यवस्था को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। जिले के लाइकेरा ब्लॉक के उडियापाली गांव के निवासी नरेश छत्रिया को अपनी पत्नी जमुना का शव बाइक पर लादकर घर ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। घटना 4 जुलाई की है, जब नरेश अपनी बीमार पत्नी को मुंद्राजोर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) ले गया था, लेकिन वहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

आरोप है कि अस्पताल प्रशासन द्वारा शव वाहन उपलब्ध न कराए जाने के कारण नरेश को अपने पड़ोसी की बाइक का सहारा लेना पड़ा। मुंद्राजोर CHC से उडियापाली गांव की दूरी लगभग पांच किलोमीटर है, जिसे नरेश ने पत्नी के शव के साथ बाइक पर तय किया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।

पोस्टमार्टम के डर और सामाजिक रीति-रिवाजों का रहस्य

इस मामले के सामने आने के बाद कुछ मीडिया रिपोर्टों में एक चौंकाने वाला दावा किया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नरेश छत्रिया ने एंबुलेंस का इंतजार ही नहीं किया, क्योंकि उसे डर था कि अस्पताल में पत्नी का पोस्टमार्टम कर दिया जाएगा। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यदि शव का पोस्टमार्टम होता है, तो परिवार को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है और पूरे समाज को एक बड़ा भोज देना अनिवार्य हो जाता है। इसी आर्थिक और सामाजिक दबाव के भय से नरेश ने आनन-फानन में पत्नी के शव को चादर से ढका और बिना किसी सरकारी वाहन के घर की ओर निकल पड़ा। यह दावा स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त कुप्रथाओं की ओर भी इशारा करता है।

स्वास्थ्य विभाग की सफाई: परिवार ने खुद लिया फैसला

झारसुगुड़ा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CDMO) डॉ. शक्ति प्रसाद पाधी ने मामले पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि मुंद्राजोर CHC में कोई स्थायी शव वाहन उपलब्ध नहीं है। उन्होंने सफाई दी कि प्रशासन दूसरी जगह से वाहन का इंतजाम कर रहा था, लेकिन परिजन पोस्टमार्टम से बचने के लिए लिखित अंडरटेकिंग (अस्वीकृति पत्र) देकर शव को अपने साथ ले गए। स्वास्थ्य विभाग ने घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। डॉ. पाधी ने आश्वासन दिया है कि यदि इस मामले में किसी भी डॉक्टर या कर्मचारी की लापरवाही पाई गई, तो उनके खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

दाना माझी की दर्दनाक यादें और प्रशासनिक विफलता

इस घटना की तुलना अगस्त 2016 की उस शर्मनाक घटना से की जा रही है, जब कालाहांडी के दाना माझी को अपनी पत्नी का शव कंधे पर उठाकर 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था। उस समय वह दृश्य पूरे देश के लिए स्तब्ध कर देने वाला था, जिसने स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को वैश्विक स्तर पर उजागर किया था। उस घटना के बाद ओडिशा सरकार ने ‘महाप्रयाण योजना’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की थीं, जिसके तहत मुफ्त शव वाहन सेवा का वादा किया गया था।

आज, 10 साल बाद झारसुगुड़ा की यह घटना यह दर्शाती है कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई अभी भी कितनी गहरी है। क्या सरकारें वाकई उन गरीब परिवारों तक पहुंच पा रही हैं, जिन्हें अंतिम समय में अपनों को सम्मान के साथ विदा करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है? यह सवाल अब एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था के सामने खड़ा हो गया है।

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