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New IT Rules 2026: AI और डीपफेक पर सरकार का सख्त एक्शन, आईटी नियमों में बड़े बदलाव के साथ नई गाइडलाइंस जारी

क्या आप भी एआई से तस्वीरें या वीडियो बनाते हैं? भारत सरकार ने 'IT Rules 2026' के जरिए एक ऐसा जाल बुना है जिससे अब कोई भी डीपफेक बनाने वाला बच नहीं पाएगा। 3 घंटे के भीतर कंटेंट हटाने के नियम ने टेक दिग्गजों की नींद उड़ा दी है। जानिए अंदर की पूरी खबर।

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Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 10, 2026

New IT Rules 2026:  इंटरनेट की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते खतरों और डीपफेक के जरिए फैलाई जा रही भ्रामक सूचनाओं पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। सरकार ने ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021’ में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। ये नए नियम 20 फरवरी 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो जाएंगे। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जवाबदेही तय करना और आम नागरिकों को एआई जनरेटेड फर्जीवाड़े से बचाना है। अब सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद कंटेंट की सत्यता की निगरानी पहले से कहीं अधिक मुस्तैदी से करें।

‘सिंथेटिक कंटेंट’ की नई परिभाषा और एडिटिंग की सीमाएं

सरकार ने पहली बार ‘सिंथेटिकली जेनरेटेड इंफॉर्मेशन’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है। इसके दायरे में वे सभी ऑडियो, वीडियो, फोटो या टेक्स्ट आएंगे जिन्हें एल्गोरिद्म के जरिए इस तरह तैयार किया गया है कि वे दिखने में बिल्कुल वास्तविक लगें। हालांकि, सरकार ने रचनात्मक कार्यों और तकनीकी सुधारों को राहत भी दी है। सामान्य फोटो एडिटिंग, कलर करेक्शन, भाषा अनुवाद या डॉक्यूमेंटेशन जैसे कार्यों को ‘सिंथेटिक कंटेंट’ की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा, बशर्ते उनका उपयोग किसी व्यक्ति को भ्रमित करने या जाली रिकॉर्ड बनाने के लिए न किया गया हो। यह स्पष्टता कंटेंट क्रिएटर्स और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए राहत की बात है।

36 घंटे नहीं, अब महज 3 घंटे में हटाना होगा भ्रामक एआई कंटेंट

नए संशोधनों में सबसे कड़ा प्रावधान समय सीमा को लेकर है। यदि किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उनके नेटवर्क पर मौजूद अवैध या भ्रामक एआई कंटेंट (जैसे डीपफेक) की शिकायत मिलती है या जानकारी होती है, तो उसे अब केवल 3 घंटे के भीतर हटाना होगा। गौर करने वाली बात यह है कि पहले यह समय सीमा 36 घंटे थी। इसके अलावा, कानून-व्यवस्था से जुड़ी किसी भी संवेदनशील जानकारी को हटाने का निर्देश अब कम से कम डीआईजी (DIG) या उससे ऊपर के स्तर के अधिकारी ही दे सकेंगे। यह बदलाव आपातकालीन स्थितियों में भ्रामक सूचनाओं के प्रसार को रोकने के लिए किया गया है।

यूजर जागरूकता और कड़े कानूनों का हवाला

सरकार ने अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे हर तीन महीने में अपने यूजर्स को नियमों और कानूनों के प्रति जागरूक करें। कंपनियों को अपने यूजर्स को स्पष्ट रूप से चेतावनी देनी होगी कि एआई के जरिए अवैध या आपत्तिजनक सामग्री साझा करना भारी पड़ सकता है। ऐसी गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने पर आईटी एक्ट, भारतीय न्याय संहिता 2023, पॉक्सो (POCSO) एक्ट और महिलाओं के अशोभनीय चित्रण रोकने वाले कानूनों के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह कदम डिजिटल स्पेस में उत्तरदायित्व की भावना पैदा करने के लिए उठाया गया है।

एआई कंटेंट की पहचान और लेबलिंग अनिवार्य: मेटाडेटा का उपयोग

अब किसी भी एआई जनरेटेड सामग्री को सोशल मीडिया पर बिना ‘लेबल’ के साझा नहीं किया जा सकेगा। कंपनियों को ऐसे तकनीकी उपकरण विकसित करने होंगे जो एआई सामग्री की पहचान कर सकें और उसमें एक स्थायी डिजिटल पहचान या मेटाडेटा जोड़ सकें। इस मेटाडेटा को हटाया नहीं जा सकेगा, जिससे भविष्य में उस कंटेंट के स्रोत का पता लगाया जा सके। साथ ही, बच्चों के यौन शोषण, बिना सहमति के निजी वीडियो, फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और हिंसा भड़काने वाली एआई सामग्री को रोकने की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्लेटफॉर्म की होगी।

कंपनियों की जवाबदेही और भारतीय न्याय संहिता का एकीकरण

नए नियमों के तहत बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों (Significant Social Media Intermediaries) को अब अपने यूजर्स से यह डिक्लेरेशन (घोषणा) करवानी होगी कि उनके द्वारा साझा किया जा रहा कंटेंट एआई जनरेटेड है या नहीं। यदि कंपनियां इन नियमों का पालन करने में विफल रहती हैं, तो उन्हें मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ यानी कानूनी सुरक्षा समाप्त की जा सकती है, जिससे वे तीसरे पक्ष के कंटेंट के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी होंगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने पुराने दंड विधानों की जगह अब भारतीय न्याय संहिता 2023 को इन नियमों में शामिल किया है, जो देश के नए आपराधिक कानूनों के साथ सामंजस्य स्थापित करता है।

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