Hamid Ansari controversy: भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी एक बार फिर अपने एक बयान को लेकर सुर्खियों में आ गए हैं। उनके इस ताज़ा बयान ने देश की राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। अंसारी ने अपने एक संबोधन के दौरान दावा किया है कि भारत को असली खतरा वामपंथ यानी कम्युनिज्म से नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से है। उनके इस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, जिसमें आलोचकों का कहना है कि इसके जरिए बहुसंख्यक समाज को एक बार फिर गलत तरीके से निशाना बनाया गया है।
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जवाहरलाल नेहरू के बयान का दिया हवाला

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए हामिद अंसारी ने पूर्व विदेश सचिव जगत सिंह गुंडेविया के दस्तावेजों में दर्ज देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक पुराने बयान का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की एक बैठक के दौरान नेहरू ने यह चेतावनी दी थी कि भारत के लोकतंत्र और आंतरिक व्यवस्था के लिए वास्तविक चुनौती कम्युनिज्म से ज्यादा हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से जुड़ी हुई है। अंसारी ने इसी ऐतिहासिक संदर्भ को वर्तमान परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हुए अपनी बात रखी, जिसे लेकर अब आलोचक उन पर तीखे हमले कर रहे हैं।
पूर्व उपराष्ट्रपति के पुराने विवादित प्रसंग

हामिद अंसारी का नाम पहले भी कई विवादों से जुड़ चुका है। आलोचकों और मीडिया रिपोर्ट्स में अक्सर यह मुद्दा उठाया जाता है कि जब वह ईरान में भारत के राजदूत थे, तब कथित तौर पर उन पर भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ (RAW) के अधिकारियों की सुरक्षा को खतरे में डालने के आरोप लगे थे। यहां तक कि रॉ के कुछ पूर्व अधिकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इन गंभीर आरोपों की उच्च-स्तरीय जांच कराने की मांग भी की थी। इसके अलावा, इतिहास से जुड़े बयानों को लेकर भी वह अतीत में आलोचनाओं के घेरे में आ चुके हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का विदाई भाषण और तंज

हामिद अंसारी के कार्यकाल का अंतिम दिन 10 अगस्त 2017 था, जो उनके बतौर उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति का आखिरी दिन भी था। उस अवसर पर संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके विदाई भाषण के दौरान एक विशेष टिप्पणी की थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने उनके लंबे प्रशासनिक और कूटनीतिक करियर के साथ-साथ उनके पिछले 10 वर्षों के कार्यकाल पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि शायद उनके भीतर भी लंबे समय से कोई वैचारिक छटपटाहट रही होगी। हालांकि, पदमुक्त होने के बाद अब उन्हें उस दायरे से मुक्ति मिल जाएगी और स्वतंत्रता का एक नया अहसास होगा। पीएम मोदी ने यह भी कहा था कि इन 10 वर्षों में उन्होंने अपने कार्यकाल को पूरी तरह से संविधान के दायरे में रहकर निभाने का भरपूर प्रयास किया है।
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