MP UCC Bill: UCC बिल पर मध्यप्रदेश विधानसभा की मुहर, दूसरे राज्यों से कैसे अलग है मॉडल?

मध्यप्रदेश विधानसभा में मंगलवार को समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक को मंजूरी दे दी गई है। इस ऐतिहासिक फैसले पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सदन में सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि जब भगवान ने सभी को एक जैसा बनाया है

MP UCC Bill

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जुलाई 21, 2026

MP UCC Bill: मध्यप्रदेश की राजनीति और विधायी इतिहास में मंगलवार का दिन एक बड़े बदलाव का गवाह बना, जब राज्य विधानसभा में भारी हंगामे और विपक्ष के तीखे विरोध के बीच ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। सदन में जारी गतिरोध के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सरकार का मजबूत पक्ष रखा। सीएम ने दार्शनिक और संवैधानिक तर्क देते हुए कहा कि जब ईश्वर ने सभी मनुष्यों को एक समान बनाया है, तो इंसानों द्वारा बनाए गए कानूनों में भी पूर्ण समानता होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि अब मध्यप्रदेश में ‘राम से रहीम’ तक और ‘एंथनी से अकबर’ तक, सभी नागरिक एक ही साझा संविधान और नागरिक संहिता के दायरे में आएंगे। अपने संबोधन के दौरान सीएम ने एक सर्वे का हवाला देते हुए बड़ा दावा किया कि राज्य की 76 प्रतिशत मुस्लिम बहनों और 40 प्रतिशत मुस्लिम भाइयों ने आंतरिक रूप से इस समान नागरिक संहिता का पुरजोर समर्थन किया है, क्योंकि यह कानून उनके अधिकारों की रक्षा करता है।

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क्या हैं UCC के मुख्य प्रावधान? जस्टिस देसाई कमेटी की रिपोर्ट पर मुहर

मध्यप्रदेश का यह नया यूसीसी बिल सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है। यह एक अत्यंत व्यापक कानूनी दस्तावेज है, जिसे निम्नलिखित संरचना के साथ तैयार किया गया है:

विधेयक का ढांचा: इस पूरे कानून को कुल 4 मुख्य भागों, 404 जटिल धाराओं और 7 विस्तृत अनुसूचियों (Schedules) में विभाजित किया गया है।

जनता की भागीदारी: कानून को अंतिम रूप देने से पहले समिति ने व्यापक जन-संवाद किया, जिसके तहत जनता से 9.58 लाख से भी अधिक लिखित और ऑनलाइन सुझाव प्राप्त हुए थे।

मुख्य कानूनी बदलाव: इस नए कानून के लागू होने से मध्यप्रदेश में विवाह (Marriage), तलाक (Divorce), भरण-पोषण (Maintenance), पैतृक व अर्जित जमीन-जायदाद के उत्तराधिकार, बच्चा गोद लेने (Adoption) और सरोगेसी (Surrogacy) जैसे सभी संवेदनशील पारिवारिक मामलों में धर्म और जाति के भेदभाव के बिना सभी नागरिकों पर एक समान नियम लागू होंगे। इस विधेयक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अलावा, टेस्ट ट्यूब बेबी (IVF) या तकनीकी माध्यमों से पैदा होने वाले बच्चों को भी समाज में समान कानूनी और उत्तराधिकार का दर्जा दिया गया है।

उत्तराखंड, गुजरात और असम से कितना अलग है मध्यप्रदेश का मॉडल?

भारत में समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना था, जिसके बाद गुजरात और असम ने भी इसे अपने-अपने स्तर पर अमलीजामा पहनाया। अब मध्यप्रदेश इस सूची में शामिल होने वाला नया राज्य है। मूल रूप से यूसीसी का अर्थ देश या राज्य के सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है, जिससे धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) समाप्त हो जाते हैं।

शादी की उम्र में एकरूपता: उत्तराखंड, गुजरात और असम की तरह ही मध्यप्रदेश में भी सभी धर्मों के पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है।

लिव-इन रिलेशनशिप पर रुख: उत्तराखंड पहला राज्य था जिसने लिव-इन को कानूनी मान्यता देते हुए पंजीकरण न कराने पर दंड का प्रावधान किया, जिसे बाद में असम ने भी अपनाया। मध्यप्रदेश ने भी इसी मॉडल को प्राथमिकता दी है।

उत्तराधिकार के नियम और राज्यों के बीच सजा का अंतर

उत्तराधिकार (Inheritance) के मामले में असम, गुजरात, उत्तराखंड और अब मध्यप्रदेश ने भी प्रक्रिया को पूरी तरह सरल और लैंगिक रूप से समान बना दिया है। नए नियमों के अनुसार, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर उसकी पत्नी, बेटों और बेटियों को बिल्कुल बराबर का कानूनी अधिकार प्राप्त होगा। हालांकि, यह साफ किया गया है कि यदि किसी नागरिक ने जीवित रहते हुए अपनी संपत्ति की वैध वसीयत (Will) पहले से तैयार कर रखी है, तो उस पर यूसीसी के उत्तराधिकार नियम थोपे नहीं जाएंगे; यह कानून केवल बिना वसीयत किए मृत्यु (Intestate) के मामलों में ही प्रभावी होगा।

इन सभी राज्यों में सबसे बड़ा व्यावहारिक अंतर नियमों के उल्लंघन पर मिलने वाली सजा और जुर्माने की प्रकृति में है:

राज्यमुख्य फोकस और दंडात्मक प्रावधान

उत्तराखंड मुख्य ध्यान नियमों के व्यवस्थित पालन और अनिवार्य रजिस्ट्रेशन पर है; उल्लंघन करने पर सामान्य दंडात्मक कार्रवाई होती है।

गुजरात यहाँ शादी या लिव-इन रिलेशनशिप का समय पर पंजीकरण न कराने पर बेहद कड़े आर्थिक जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

असम असम का मॉडल सबसे सख्त है, जहाँ पंजीकरण की अनदेखी करने पर भारी जुर्माने के साथ-साथ जेल की सजा का भी प्रावधान है।

मध्यप्रदेश सरकार अब इस पारित विधेयक को अंतिम मंजूरी के लिए महामहिम राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास भेजेगी, जिसके बाद यह पूरे प्रदेश में विधिवत रूप से प्रभावी हो जाएगा।

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