Live-in Relationship: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला और पुरुष लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं, तो अलगाव की स्थिति में महिला भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) की हकदार होगी, भले ही शादी का औपचारिक कानूनी प्रमाण उपलब्ध न हो।
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मामला और कोर्ट का आदेश
यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने मुनीश कुमार की दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए दिया। याचिका में तर्क दिया गया था कि महिला केवल लिव-इन रिलेशन में थी और शादी का प्रमाण 10 रुपये के स्टैम्प पेपर पर था, इसलिए वह कानूनी रूप से पत्नी नहीं मानी जा सकती। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि कानून केवल तकनीकी खामियों के आधार पर पुरुष को अपनी जिम्मेदारी से नहीं बचा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, चममुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा का हवाला देते हुए बताया कि ‘पत्नी’ शब्द की व्याख्या व्यापक होनी चाहिए।
परिवार अदालत का भरण-पोषण आदेश

परिवार अदालत मुरादाबाद ने महिला और उनके बेटे के लिए कुल 18 हजार रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता निर्धारित किया। इसमें महिला को 12 हजार और बेटे को 6 हजार रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया गया। याची पुरुष रेलवे में लोको पायलट हैं और उनकी शुद्ध मासिक आय लगभग 70 हजार रुपये है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, आय का लगभग 25 प्रतिशत भरण-पोषण में दिया जा सकता है। इस आधार पर 18 हजार रुपये की राशि को उचित ठहराया गया।
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भरण-पोषण का उद्देश्य
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य महिला और बच्चे को आर्थिक असुरक्षा और बेघर होने से बचाना है। कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशन में रहने वाली महिलाएं भी आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से भत्ता पाने की हकदार हैं। कोर्ट के अनुसार, अगर पुरुष लंबे समय तक पत्नी की तरह संबंध निभाते हैं, तो उन्हें कानूनी तकनीकीताओं का लाभ उठाकर महिला की सुरक्षा और हक को सीमित नहीं करना चाहिए।









