Kiran Bedi: आर्म्ड फोर्स के दुरुपयोग पर किरण बेदी की दो टूक, दिया बड़ा संदेश

पूर्व आईपीएस किरण बेदी ने कानून-व्यवस्था और विरोध प्रदर्शनों से निपटने के तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि हर स्थिति में सशस्त्र बलों (आर्म्ड फोर्स) का इस्तेमाल गलत है

Kiran Bedi

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जुलाई 30, 2026

Kiran Bedi: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के हालिया प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल और विधि-व्यवस्था की स्थिति पर देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने मौजूदा पुलिसिंग और विरोध प्रदर्शनों से निपटने के तौर-तरीकों पर खुलकर बात की है। उनका मानना है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति को संभालने के लिए जिस तरह से तुरंत सशस्त्र बलों (Armed Forces) का इस्तेमाल किया जाता है, वह पूरी तरह से गलत है और इस ब्रिटिश कालीन व्यवस्था से देश को बाहर निकलने की सख्त जरूरत है।

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स्टूडेंट प्रोटेस्ट और आर्म्ड फोर्सेज का सीधा टकराव सिस्टम की कमी

किरण बेदी ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि छात्र प्रदर्शनकारियों को सीधे तौर पर सशस्त्र बलों के सामने क्यों लाकर खड़ा कर दिया जाता है। उन्होंने इसे पूरी तरह से सिस्टम की बड़ी विफलता करार दिया है। उनके अनुसार, अंग्रेजों के समय से चली आ रही इस व्यवस्था में जरा सी बात पर लाठीचार्ज और हथियारों से लैस बलों को मैदान में उतार दिया जाता है, जो कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिहाज से बिल्कुल भी उचित नहीं है।

सिविल डिफेंस हो प्रोटेस्ट की पहली लाइन ऑफ डिफेंस

पूर्व आईपीएस अधिकारी ने विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए एक नया और प्रभावी खाका सुझाया है। उनका कहना है कि किसी भी छात्र प्रदर्शन में पहली लाइन ऑफ डिफेंस सिविल पुलिस या सिविल डिफेंस होनी चाहिए। हमारे देश के हर राज्य में प्रशिक्षित युवा (महिला और पुरुष) सिविल डिफेंस के रूप में मौजूद हैं। सबसे खास बात यह होगी कि इस पहली पंक्ति के युवाओं के पास किसी भी प्रकार की लाठी या हथियार नहीं होंगे, जिससे हिंसक झड़पों की गुंजाइश अपने आप काफी हद तक कम हो जाएगी।

महिला पुलिस हो सकती है सेकेंड लाइन ऑफ डिफेंस

किरण बेदी के मुताबिक, यदि प्रदर्शनकारी अनियंत्रित होकर आगे बढ़ते हैं और बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश करते हैं, तो दूसरी लाइन ऑफ डिफेंस के रूप में महिला पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कोई प्रदर्शनकारी महिला पुलिस पर सीधे हमला करना चाहेगा? कैमरे लगातार हर गतिविधि पर नजर रख रहे होते हैं। इन महिला सुरक्षाकर्मियों के पास भी लाठियां नहीं होती हैं, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से उनके पास हेडगियर और बॉडी आर्मर जरूर होते हैं ताकि पथराव की स्थिति में उन्हें चोटों से बचाया जा सके।

भीड़ के बेकाबू होने पर ही अंतिम विकल्प हो आर्म्ड पुलिस

किरण बेदी ने स्पष्ट किया कि सशस्त्र पुलिस (Armed Police) का इस्तेमाल केवल और केवल अंतिम उपाय के रूप में होना चाहिए। जब भीड़ पूरी तरह से बेकाबू हो जाए, तभी बल प्रयोग का निर्णय लिया जाना चाहिए। यह आर्म्ड पुलिस की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वाटर कैनन, आंसू गैस या लाठीचार्ज का इस्तेमाल कब और कैसे करना है। यदि सबसे अंतिम चरण में भी हथियारों का प्रयोग करना पड़े, तो ड्रोन कैमरों से लगातार निगरानी होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कौन उपद्रवी है और कौन केवल तमाशबीन या जानबूझकर आग लगाने वाला शख्स है।

डेस्टिनेशन पार्लियामेंट हाउस क्यों? रामलीला मैदान हो प्रदर्शन की जगह

प्रदर्शनों के रूट और स्थल पर सवाल उठाते हुए किरण बेदी ने कहा कि हम प्रदर्शनकारियों को सीधे संसद भवन के दरवाजे दिखा रहे हैं, जो सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस तरह के बड़े प्रदर्शनों को संसद के पास लाने के बजाय रामलीला मैदान में शिफ्ट किया जाना चाहिए। जंतर-मंतर की जगह काफी छोटी है और वह मुख्य बाजार के बिल्कुल सामने स्थित है। ऐसे प्रदर्शनों से आसपास का पूरा व्यापार ठप हो जाता है और दुकानदारों को नुकसान झेलना पड़ता है। कई बार ऐसी जगहों पर सुरक्षा चूक और लूटपाट जैसी घटनाएं भी सामने आने लगती हैं।

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