UDF Victory Kerala : केरल में यूडीएफ की प्रचंड बहुमत से वापसी, लेकिन मुख्यमंत्री चयन पर फंसा पेच

केरल में मतदाताओं ने एक दशक बाद सत्ता परिवर्तन कर यूडीएफ को 102 सीटों का ऐतिहासिक जनादेश दिया है। पिनाराई विजयन के इस्तीफे के बाद अब सवाल है कि तिरुवनंतपुरम की गद्दी पर कौन बैठेगा? वी.डी. सतीशन का जमीनी आधार या के.सी. वेणुगोपाल का दिल्ली कनेक्शन, किसका पलड़ा भारी होगा?

UDF Victory Kerala

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मई 7, 2026

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UDF Victory Kerala : केरल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (UDF) के लिए खुशियों की सौगात दी है। 140 सीटों वाली विधानसभा में यूडीएफ ने 102 सीटों पर विशाल जीत दर्ज कर एलडीएफ को महज 35 सीटों पर समेट दिया है। हालांकि, इस शानदार जीत के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया जश्न मनाने के बजाय आपसी खींचतान की भेंट चढ़ती दिख रही है। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे वी.डी. सतीशन अब अपने ही एक बयान के कारण विवादों के घेरे में आ गए हैं। सतीशन ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी योग्यता सिद्ध करने के क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण दिया, जो अब उनके खिलाफ एक बड़े ‘रेड फ्लैग’ के रूप में देखा जा रहा है।

प्रशासनिक अनुभव पर तर्क: सतीशन ने दिया प्रधानमंत्री मोदी का उदाहरण

विवाद की जड़ सतीशन का वह इंटरव्यू है जिसमें उन्होंने प्रशासनिक अनुभव की कमी के आरोपों का जवाब दिया था। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बनने के लिए पूर्व प्रशासनिक अनुभव अनिवार्य नहीं है। अपने पक्ष में तर्क देते हुए उन्होंने दिग्गज नेता वी.एस. अच्युतानंदन का नाम लिया और फिर सीधे प्रधानमंत्री मोदी का संदर्भ जोड़ दिया। सतीशन ने कहा, “जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनके पास क्या प्रशासनिक अनुभव था? वे केवल एक संगठनकर्ता थे और सांसद भी नहीं थे।” सतीशन का इरादा खुद को एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में पेश करना था, लेकिन कांग्रेस की विचारधारा के विपरीत मोदी का उदाहरण देना पार्टी समर्थकों और सोशल मीडिया पर लोगों को रास नहीं आ रहा है।

सोशल मीडिया पर तीखा विरोध और “सीएम नहीं तो मंत्री भी नहीं” का सख्त रुख

सतीशन के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कई कांग्रेस समर्थकों का कहना है कि पार्टी की कमान संभालने की रेस में मोदी की प्रशंसा करना वैचारिक रूप से गलत संदेश देता है। इस विवाद के बीच सतीशन ने अपने तेवर और कड़े कर लिए हैं। सूत्रों के हवाले से खबर है कि सतीशन ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि उन्हें मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी नहीं दी जाती है, तो वे मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होंगे और केवल विधायक के रूप में काम करेंगे। विधायक दल की बैठक (CLP) के बाद उनकी चुप्पी और पत्रकारों से दूरी इस बात का संकेत है कि वे अपनी दावेदारी पर किसी भी प्रकार के समझौते के मूड में नहीं हैं।

विधायकों की राय और आलाकमान का मंथन: चांडी ओमन ने साधी चुप्पी

मुख्यमंत्री के नाम पर आम सहमति बनाने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने पर्यवेक्षक के रूप में मुकुल वासनिक और अजय माकन को तिरुवनंतपुरम भेजा है। बैठक में सभी नवनिर्वाचित विधायकों से व्यक्तिगत रूप से उनकी पसंद पूछी गई। पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के बेटे और युवा विधायक चांडी ओमन ने इस मुद्दे पर सधी हुई प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी राय पार्टी नेतृत्व को बता दी है और कांग्रेस की तय प्रक्रिया (SOP) के तहत ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। हालांकि, सतीशन के समर्थक पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। सोशल मीडिया पर “राहुल गांधी, वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाओ” हैशटैग के साथ एक लाख से अधिक कमेंट्स पोस्ट कर दबाव बनाया जा रहा है।

संगठन की मजबूती बनाम वैचारिक संतुलन: नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती

परावूर सीट से रिकॉर्ड मतों से जीतने वाले सतीशन के समर्थकों का तर्क है कि 2021 की करारी हार के बाद उन्होंने ही संगठन में नई जान फूंकी है। लेकिन अब आलाकमान के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया है। एक तरफ सतीशन का जमीनी संघर्ष और बड़ी जीत का श्रेय है, तो दूसरी तरफ उनके बयान से उपजा वैचारिक विवाद। यदि पार्टी उन्हें दरकिनार करती है, तो राज्य में असंतोष की ज्वाला भड़क सकती है, और यदि उन्हें चुनती है, तो विरोधियों को वैचारिक लाइन पर हमला करने का मौका मिल जाएगा। अब देखना यह है कि कांग्रेस नेतृत्व इस गतिरोध को कैसे सुलझाता है।

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