Shashi Tharoor: कांग्रेस के दिग्गज नेता और सांसद शशि थरूर ने केरल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले राज्य की राजनीतिक तपिश बढ़ा दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केरल की लड़ाई केवल दो ध्रुवों के बीच है और तीसरे विकल्प की गुंजाइश फिलहाल नहीं है।
एलडीएफ के कुशासन पर कड़ा प्रहार
शशि थरूर ने आगामी चुनावों को लेकर भारी उत्साह दिखाया है। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता पिछले 10 वर्षों से सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) के शासन से ऊब चुकी है। थरूर के अनुसार, लोग अब बदलाव चाहते हैं और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) इस शून्य को भरने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने अनुभवी नेताओं और युवा चेहरों के मिश्रण को कांग्रेस गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत बताया।
केरल चुनाव में भाजपा की स्थिति
भाजपा पर सीधा हमला बोलते हुए थरूर ने उसे ‘ज़ीरो-सीट’ वाली पार्टी करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि केरल की राजनीतिक ज़मीन पर भारतीय जनता पार्टी के पास वह क्षमता नहीं है कि वह LDF का विकल्प बन सके। थरूर का मानना है कि दक्षिण के इस राज्य में मुख्य चुनावी दंगल पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों—UDF और LDF—के बीच ही सिमटा रहेगा, जहाँ भाजपा महज़ एक दर्शक की भूमिका में नज़र आएगी।
राजनीति में नारी शक्ति की अनिवार्यता
सांसद शशि थरूर ने केवल चुनावी गणित पर ही बात नहीं की, बल्कि विधानसभा में महिलाओं की कम भागीदारी पर भी चिंता जताई। उन्होंने महिला आरक्षण बिल का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि जब तक आरक्षण लागू नहीं होता, महिलाओं को राजनीति में उनका उचित हक नहीं मिलेगा। उन्होंने डेटा का हवाला देते हुए बताया कि वर्तमान चुनावों में भी किसी दल ने महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया है, जहाँ कांग्रेस ने लगभग 10% और भाजपा ने 11-12% टिकट ही महिलाओं को दिए हैं।
चुनाव आयोग का बिगुल
भारत निर्वाचन आयोग ने 2026 के चुनावी शंखनाद की तारीखें स्पष्ट कर दी हैं। केरल की सभी 140 विधानसभा सीटों पर 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होगा। इस चुनावी प्रक्रिया का परिणाम 4 मई को घोषित किया जाएगा। वर्तमान सरकार का कार्यकाल 23 मई को समाप्त हो रहा है, जिससे पहले नई सरकार का गठन अनिवार्य है।
2021 के चुनावी नतीजे
पिछले विधानसभा चुनावों (2021) की यादें ताज़ा करते हुए रिपोर्ट बताती है कि पिनाराई विजयन के नेतृत्व में LDF ने 99 सीटें जीतकर इतिहास रचा था। 1977 के बाद यह पहला मौका था जब किसी गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की। उस दौरान UDF को 41 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले NDA का खाता भी नहीं खुल सका था। वोट प्रतिशत के मामले में LDF 41.5% के साथ शीर्ष पर था, जबकि UDF को 38.4% मत प्राप्त हुए थे।









