UP Election 2027: देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज होने लगी है। 403 विधानसभा सीटों वाले राज्य में सत्ता का रास्ता किन क्षेत्रों और किन सीटों से होकर गुजरेगा, इस पर राजनीतिक दलों की नजर है। चुनावी इतिहास, स्थानीय मुद्दे और सामाजिक समीकरण हर विधानसभा क्षेत्र की तस्वीर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक रहे हैं।
बताते चले कि, उत्तर प्रदेश में हर विधानसभा चुनाव ने अपने साथ एक अलग राजनीतिक ट्रेंड पेश किया है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने दिखाया कि पश्चिमी यूपी, अवध, पूर्वांचल और बुंदेलखंड जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में मतदाताओं का रुझान एक जैसा नहीं रहा। स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की छवि, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक दलों का संगठनात्मक प्रभाव सीट-दर-सीट अलग तस्वीर पेश करता है।
2017 और 2022 ने बदली यूपी की सियासी तस्वीर
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में बड़ी जीत हासिल की थी। इसके बाद 2022 के चुनाव में भी भाजपा सत्ता बरकरार रखने में सफल रही, हालांकि सीटों और वोटों के लिहाज से मुकाबले की तस्वीर 2017 से अलग रही। समाजवादी पार्टी ने 2022 में अपने 2017 के प्रदर्शन में सुधार किया और कई क्षेत्रों में मुख्य मुकाबले को मजबूत बनाया।

इन दोनों चुनावों के आंकड़ों को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यूपी की राजनीति को केवल राज्यस्तरीय लहर के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में जातीय संरचना, स्थानीय उम्मीदवार और क्षेत्रीय मुद्दे परिणामों पर प्रभाव डालते हैं।
गंगा नदी के आसपास बसे ग्रामीण इलाकों को समेटने वाली भोजपुर विधानसभा सीट फर्रुखाबाद जिले की महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों में शामिल है। इस सीट का राजनीतिक इतिहास कई बदलावों से होकर गुजरा है। 1957 और 1962 के शुरुआती चुनावों के बाद भोजपुर सीट समाप्त हुई, उसकी जगह कमालगंज विधानसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया और 2008 के परिसीमन के बाद भोजपुर सीट एक बार फिर राजनीतिक नक्शे पर लौट आई। इसके बाद से यहां मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच देखने को मिला है।
1957 से शुरू हुआ चुनावी सफर
बताते चले कि, भोजपुर विधानसभा क्षेत्र का गठन 1957 के विधानसभा चुनाव से पहले हुआ था। यह एक सामान्य यानी अनारक्षित सीट रही है और फर्रुखाबाद लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में शामिल है। शुरुआती दौर में भोजपुर सीट केवल 1957 और 1962 के विधानसभा चुनावों में अस्तित्व में रही। दोनों चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की।
इसके बाद 1967 से 2007 तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कमालगंज विधानसभा सीट के जरिए हुआ। वर्ष 2008 के परिसीमन में कमालगंज सीट समाप्त कर दी गई और उसके स्थान पर भोजपुर विधानसभा क्षेत्र को दोबारा बनाया गया। वर्तमान परिसीमन में भोजपुर, मोहम्मदाबाद और खिमसेपुर के कानूनगो सर्किल के साथ मोहम्मदाबाद और कमालगंज नगर पंचायतों को शामिल किया गया है। लिहाजा सीट का बड़ा हिस्सा आज भी ग्रामीण क्षेत्र में आता है।
2012 में सपा की जीत, भाजपा के वोट बंटने का दिखा असर

बताते चले कि, भोजपुर सीट के दोबारा अस्तित्व में आने के बाद 2012 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए अहम रहा। जमालुद्दीन सिद्दीकी ने सपा के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा में जगह बनाई। उन्होंने जन क्रांति पार्टी के मुकेश राजपूत को 18,629 मतों से हराया। उस चुनाव में भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी। खास बात यह रही कि भाजपा के बागी नेता कल्याण सिंह द्वारा बनाई गई जन क्रांति पार्टी और भाजपा, दोनों को मिले वोटों का कुल आंकड़ा सपा के वोट से काफी अधिक था। जन क्रांति पार्टी को 33,021 और भाजपा को 27,953 वोट मिले। दोनों को मिलाकर यह संख्या 60,974 वोट रही, जबकि सपा उम्मीदवार को 51,650 वोट मिले। ऐसे में 2012 का चुनाव इस बात का उदाहरण रहा कि भाजपा समर्थक वोटों के विभाजन ने परिणाम को प्रभावित किया।
2017 में बदला समीकरण, भाजपा ने छीनी सीट
आपको बता दे कि, साल 2017 तक राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी थी। कल्याण सिंह की भाजपा में वापसी और जन क्रांति पार्टी के भाजपा में विलय के बाद भाजपा ने भोजपुर में मजबूत प्रदर्शन किया।भाजपा के नागेंद्र सिंह राठौर ने सपा के उम्मीदवार अरशद जमाल सिद्दीकी को 34,877 मतों के बड़े अंतर से हराया। अरशद जमाल सिद्दीकी 2012 में चुनाव जीतने वाले जमालुद्दीन सिद्दीकी के बेटे थे।इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर नागेंद्र सिंह राठौर और अरशद जमाल सिद्दीकी आमने-सामने आए। भाजपा ने दोबारा सीट अपने कब्जे में रखी। नागेंद्र सिंह राठौर को 99,979 वोट, जबकि अरशद जमाल सिद्दीकी को 72,521 वोट मिले। इस चुनाव में भाजपा की जीत का अंतर 27,458 वोट रहा।
लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की बढ़त
भोजपुर विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा चुनावों के दौरान भी भाजपा का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है। पिछले चार लोकसभा चुनावों के आंकड़ों में तीन चुनावों में भाजपा इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे आगे रही।

- 2009 में कांग्रेस ने सपा पर 11,327 वोटों की बढ़त बनाई थी और भाजपा चौथे स्थान पर रही थी। इसके बाद 2014 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भाजपा ने सपा के मुकाबले 61,821 वोटों की बढ़त हासिल की।
- 2019 में भी भाजपा भोजपुर में सबसे आगे रही। उस चुनाव में भाजपा ने बसपा पर 33,383 वोटों की बढ़त बनाई। उस समय सपा ने फर्रुखाबाद लोकसभा सीट पर चुनाव नहीं लड़ा था और सीट सहयोगी बसपा के लिए छोड़ी थी।
- 2024 में सपा ने घटाई भाजपा की बढ़त
- 2024 के लोकसभा चुनाव में फर्रुखाबाद सीट पर सपा ने फिर से चुनाव लड़ा। इसका असर भोजपुर विधानसभा क्षेत्र के आंकड़ों में भी दिखाई दिया।
- भाजपा के मुकेश राजपूत को भोजपुर में 95,243 वोट मिले, जबकि सपा के नवल किशोर शाक्य को 86,377 वोट मिले। इस तरह भाजपा को यहां 8,866 वोटों की बढ़त मिली।
- यानी 2014 और 2019 के मुकाबले 2024 में भाजपा की बढ़त काफी कम हुई। हालांकि भाजपा विधानसभा क्षेत्र में पहले स्थान पर रही, लेकिन सपा के प्रदर्शन ने मुकाबले की तस्वीर को पहले की तुलना में ज्यादा करीबी बनाया।
2027 से पहले मतदाता संख्या में बड़ा बदलाव

भोजपुर विधानसभा क्षेत्र के लिए 2026 का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR भी महत्वपूर्ण है। पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान इस सीट पर मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ती रही थी।
- 2012: 2,87,622 मतदाता
- 2017: 3,07,153
- 2019: 3,12,199
- 2022: 3,21,402
- 2024: 3,23,030
- 2026 अंतिम पुनरीक्षित सूची: 2,80,939
2024 की तुलना में अंतिम सूची में 42,091 मतदाताओं की कमी दर्ज हुई है। प्रतिशत के लिहाज से यह करीब 13.03 प्रतिशत की गिरावट है। यह बदलाव 2027 के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि पुराने चुनावी आंकड़ों और मौजूदा मतदाता सूची की तुलना करते समय मतदाताओं के आधार में काफी अंतर दिखाई देगा। हालांकि इस बदलाव का वास्तविक चुनावी प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है।
मतदान प्रतिशत भी रहा अपेक्षाकृत स्थिर
भोजपुर में विधानसभा चुनावों के दौरान मतदान प्रतिशत 60 प्रतिशत के आसपास या उससे ऊपर रहा है।2012 में यहां 59.92 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2017 में यह बढ़कर 61.12 प्रतिशत हुआ। 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत घटकर 59.35 प्रतिशत रहा। 2022 के विधानसभा चुनाव में यह फिर बढ़कर 61.74 प्रतिशत पहुंच गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत 59.65 प्रतिशत रहा।

इससे पता चलता है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत में कुछ अंतर जरूर रहा, लेकिन क्षेत्र में मतदान का स्तर लगातार करीब 60 प्रतिशत के आसपास बना रहा।
सामाजिक समीकरण भी चुनाव में अहम
भोजपुर विधानसभा क्षेत्र हिंदू बहुल क्षेत्र है, लेकिन यहां मुस्लिम मतदाता भी चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी करीब 15.70 प्रतिशत और अनुसूचित जाति की आबादी 17.33 प्रतिशत थी। 2022 के चुनाव पर आधारित अनुमानित सामाजिक आंकड़ों में ठाकुर या राजपूत मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 16.38 प्रतिशत, लोधी 10.42 प्रतिशत, मुस्लिम 11.91 प्रतिशत, जाटव 8.74 प्रतिशत और यादव मतदाता करीब 7.14 प्रतिशत बताए गए थे।इसके अलावा शाक्य, कुर्मी, ब्राह्मण और अन्य सामाजिक समूह भी सीट के चुनावी समीकरण में भूमिका रखते हैं।
क्षेत्र की करीब 90.89 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है, जबकि लगभग 9.11 प्रतिशत आबादी मोहम्मदाबाद और कमालगंज के शहरी क्षेत्रों में है। इसलिए भोजपुर की राजनीति में ग्रामीण मतदाताओं और कृषि से जुड़े मुद्दों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।
गंगा किनारे कृषि है अर्थव्यवस्था का आधार
भोजपुर की भौगोलिक पहचान भी इसकी राजनीति और सामाजिक संरचना से जुड़ी हुई है। गंगा नदी के आसपास की उपजाऊ जलोढ़ भूमि कृषि के लिए अनुकूल है। यहां गेहूं, धान, आलू और दूसरी फसलों की खेती होती है।कृषि के साथ पशुपालन और उससे जुड़ी गतिविधियां भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। व्यापक फर्रुखाबाद क्षेत्र में ब्लॉक प्रिंटिंग और जरी जैसे पारंपरिक काम भी रोजगार के स्रोत रहे हैं। कमालगंज और मोहम्मदाबाद आसपास के गांवों के लिए बाजार और व्यापारिक केंद्र का काम करते हैं।
राजा भोज और पुराने किले से जुड़ी स्थानीय मान्यता
भोजपुर के नाम को लेकर स्थानीय परंपरा इसे मालवा के 11वीं शताब्दी के प्रसिद्ध परमार शासक राजा भोज से जोड़ती है। हालांकि भारत के कई स्थानों के नाम राजा भोज से जुड़े होने के कारण इस परंपरा को स्थानीय ऐतिहासिक मान्यता के रूप में देखना अधिक उचित है।फर्रुखाबाद जिला गजेटियर में भोजापुर के पुराने किले का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार 13वीं शताब्दी के अंतिम दौर में सुल्तान जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने भोजापुर के किले का दौरा किया था। स्थानीय इतिहास में यह भी माना जाता है कि उनके समय में इसके पास गंगा नदी पर पुल का निर्माण कराया गया था।आज का भोजपुर हालांकि एक सामान्य कृषि प्रधान ग्रामीण बस्ती के रूप में विकसित है।
कमालगंज और मोहम्मदाबाद से जुड़ा क्षेत्र
भोजपुर विधानसभा क्षेत्र की कनेक्टिविटी में कमालगंज और मोहम्मदाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। कमालगंज स्थानीय बाजार और परिवहन का केंद्र है। यहां रेलवे स्टेशन भी है, जहां से फर्रुखाबाद और कन्नौज की दिशा में रेल संपर्क मिलता है।भोजपुर फतेहगढ़ से करीब 15 से 20 किलोमीटर और कमालगंज फतेहगढ़ से करीब 10 से 15 किलोमीटर की दूरी पर बताया जाता है। कन्नौज करीब 40 से 45 किलोमीटर, कानपुर करीब 125 से 130 किलोमीटर और लखनऊ सड़क मार्ग से करीब 160 से 170 किलोमीटर दूर है।
2027 से पहले क्या कहती है भोजपुर की चुनावी तस्वीर?

भोजपुर की अब तक की चुनावी कहानी में तीन महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। पहला, 2012 के बाद से विधानसभा चुनावों में भाजपा ने लगातार दो जीत दर्ज की हैं। दूसरा, 2014 के बाद हुए तीन लोकसभा चुनावों में भाजपा इस विधानसभा क्षेत्र में आगे रही है। तीसरा, 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने भाजपा की बढ़त को घटाकर 8,866 वोट कर दिया। इसके साथ ही 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता संख्या में करीब 42 हजार की कमी दर्ज होना भी 2027 के चुनाव से पहले एक बड़ा प्रशासनिक और चुनावी बदलाव है।
हालांकि केवल पुराने चुनावी आंकड़ों या मतदाता संख्या में बदलाव के आधार पर 2027 के परिणाम का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। उम्मीदवार, गठबंधन, स्थानीय मुद्दे, मतदान प्रतिशत और अंतिम मतदाता सूची समेत कई कारक चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, भोजपुर विधानसभा सीट का इतिहास कांग्रेस के शुरुआती दौर से शुरू होकर सपा की 2012 की जीत और 2017 व 2022 में भाजपा के लगातार दो विधानसभा विजय तक पहुंचता है। 2024 में लोकसभा स्तर पर सपा द्वारा भाजपा की बढ़त को काफी कम किया जाना और 2026 के SIR के बाद मतदाता सूची में बड़ा बदलाव—दोनों ही तथ्य 2027 से पहले भोजपुर विधानसभा क्षेत्र को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाए रखते हैं।










