Karnataka Politics: पड़ोसी राज्य केरल में सरकार गठन की प्रक्रिया को संभालने के बाद, कांग्रेस आलाकमान के सामने अब कर्नाटक की राजनीतिक चुनौती एक बार फिर से खड़ी हो गई है। कर्नाटक कांग्रेस के भीतर शीर्ष नेतृत्व को लेकर लंबे समय से चली आ रही अंदरूनी खींचतान अब दोबारा पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की चर्चाओं के केंद्र में आ गई है। गौरतलब है कि पिछले साल के अंत में देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस विवाद को कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था, क्योंकि तब पार्टी का पूरा ध्यान चुनावी राज्यों पर केंद्रित था।
इससे पहले नवंबर महीने में भी कर्नाटक कांग्रेस में एक बड़ा टकराव देखने को मिला था, जब मुख्यमंत्री बदलने की जोरदार अटकलों ने राज्य की राजनीतिक हवा को गर्म कर दिया था। उस वक्त कांग्रेस आलाकमान किसी स्थाई समाधान पर पहुंचे बिना ही इस संकट को अस्थायी रूप से टालने में सफल रहा था, लेकिन अब यह मुद्दा पूरी तरह गरमा चुका है।
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कर्नाटक में फिर तेज हुई सियासी जंग
केरल का मसला काफी हद तक सुलझने के बाद, अब दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक पार्टी का पूरा ध्यान कर्नाटक पर टिक गया है। राज्य में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच की राजनीतिक जंग एक बार फिर सतह पर आ गई है। इस विवाद के दोबारा बढ़ने के पीछे कैबिनेट विस्तार की सुगबुगाहट है।
जहां एक तरफ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपनी कैबिनेट में फेरबदल करने और खाली पड़े मंत्री पदों को जल्द से जल्द भरने के लिए आलाकमान पर जोर दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ डीके शिवकुमार मौजूदा कार्यकाल के दौरान ही मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने की अपनी महत्वाकांक्षा को लेकर अड़े हुए हैं। कांग्रेस के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस मोड़ पर कैबिनेट में कोई बड़ा फेरबदल होता है, तो इससे शिवकुमार की मुख्यमंत्री बनने की उम्मीदें कमजोर पड़ सकती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि फेरबदल के जरिए सिद्धारमैया प्रशासन और विधायक दल पर अपनी पकड़ को और ज्यादा मजबूत कर लेंगे।
विरोधी खेमों की रणनीतियां और विधायकों की लॉबिंग
इस पूरी सियासी बिसात पर दोनों ही खेमे अपनी-अपनी गोटियां सेट करने में जुटे हैं। माना जा रहा है कि सिद्धारमैया का गुट फिलहाल ‘इंतजार करो और देखो’ की सुरक्षित रणनीति पर काम कर रहा है। इसके विपरीत, डीके शिवकुमार का खेमा बेहद आक्रामक है और वह कांग्रेस आलाकमान को सरकार गठन के समय हुए कथित ‘सत्ता-साझाकरण समझौते’ (Power Sharing Formula) की लगातार याद दिला रहा है।
इस अंदरूनी लड़ाई को हवा देने का काम कांग्रेस के वे विधायक भी कर रहे हैं, जो कैबिनेट विस्तार या फेरबदल की स्थिति में खुद के लिए मंत्री पद पाने की खातिर दोनों तरफ से जोरदार लॉबिंग कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले कुछ दिन कर्नाटक की राजनीति के लिए बेहद संवेदनशील माने जा रहे हैं, और केंद्रीय आलाकमान सरकार की स्थिरता को बनाए रखने के लिए यहां के हर घटनाक्रम पर बारीक नजर रख रहा है।
पोस्टर्स और जन्मदिन के आयोजनों ने दी अटकलों को हवा
इस सियासी खींचतान के बीच, हाल ही में कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के दफ्तर के बाहर और राज्य के विभिन्न हिस्सों में लगे नए पोस्टर्स ने इस विवाद को सार्वजनिक कर दिया है। डीके शिवकुमार के जन्मदिन के मौके पर लगाए गए इन पोस्टरों में उन्हें न केवल बधाई दी गई है, बल्कि कुछ पोस्टर्स में उन्हें “कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री” तक घोषित कर दिया गया है। इसके अलावा मैसूर में शिवकुमार के समर्थकों द्वारा काटे गए एक केक पर भी उन्हें राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में दर्शाया गया, जिससे सिद्धारमैया खेमे में बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है।
सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की क्या हैं मांगें?
दोनों नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं और मांगें हैं, जिन्हें वे आलाकमान के सामने रख रहे हैं—
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की चाहत
जल्द से जल्द कैबिनेट में फेरबदल करना ताकि नए विधायकों को मौका दिया जा सके। मंत्रिमंडल में खाली पड़े पदों को भरकर विधायकों की नाराजगी दूर करना। मुख्यमंत्री के तौर पर प्रशासनिक और राजनैतिक मोर्चे पर अपनी स्थिति को और मजबूत करना। यदि आलाकमान नेतृत्व परिवर्तन पर फैसला टाल देता है, तो इसे अपने राजनैतिक फायदे के रूप में इस्तेमाल करना। मुख्यमंत्री पद के विवाद को आगामी ‘ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी’ (GBA) और स्थानीय निकाय चुनावों तक के लिए टालना।
उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की मांगें
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (KPCC) रहते हुए उनके नेतृत्व में मिली रिकॉर्ड तोड़ विधानसभा जीत का उन्हें उचित इनाम मिले। वर्तमान पांच साल के कार्यकाल के दौरान ही उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में पर्याप्त समय मिले, ताकि वे अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित कर सकें। उनके नेतृत्व में राज्य में एक नए मंत्रिमंडल का गठन किया जाए। यदि आलाकमान उन्हें मुख्यमंत्री का ऊंचा पद सौंपता है, तो वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस आलाकमान सरकार बनते समय सत्ता-बंटवारे को लेकर किए गए अपने कथित “वादे” का पूरा सम्मान करे।
आलाकमान के सामने खड़ी है सबसे बड़ी दुविधा
देखा जाए तो कांग्रेस आलाकमान के लिए अब तक इस अंतिम फैसले में देरी करना ही सबसे सुरक्षित रणनीति साबित हुई है। लेकिन अब जिस तरह से दोनों विरोधी खेमे लगातार दबाव बना रहे हैं और बयानबाजी सार्वजनिक हो रही है, उसे देखते हुए इस मुद्दे को अनिश्चित काल के लिए टालना मुश्किल नजर आ रहा है। आलाकमान अब जो भी फैसला लेगा—चाहे वह सिद्धारमैया के नेतृत्व को जारी रखने का हो या डीके शिवकुमार को सत्ता सौंपने का—उससे किसी न किसी एक बड़े धड़े की नाराजगी और राजनीतिक विद्रोह झेलना तय माना जा रहा है।
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