Karnataka News: पति-पत्नी के अलग रहने पर हाईकोर्ट ने साफ की तस्वीर, अवैध गिरफ्तारी पर पुलिस को बड़ा झटका

कर्नाटक हाईकोर्ट के दो फैसलों ने वैवाहिक विवाद और पुलिस कार्रवाई को लेकर अहम सवालों के जवाब दिए हैं। अदालत ने कहा कि पति-पत्नी का अलग कमरों में रहना अकेले वैवाहिक क्रूरता नहीं है। वहीं, कथित अवैध गिरफ्तारी के मामले में पुलिस अधिकारियों पर सख्ती करते हुए ₹3 लाख देने का आदेश दिया गया।

पति-पत्नी के अलग रहने पर हाईकोर्ट ने साफ की तस्वीर

Wrriten By :

Neha Mishra

Published On :

अगस्त 29, 2026

Karnataka News: कर्नाटक हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में अहम टिप्पणियां करते हुए वैवाहिक संबंधों और पुलिस कार्रवाई से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट किया है। एक मामले में अदालत ने कहा कि पति-पत्नी का एक ही घर में अलग-अलग कमरों में रहना मात्र अपने आप में वैवाहिक क्रूरता साबित नहीं करता। वहीं, दूसरे मामले में कोर्ट ने जल्दबाजी और कथित गैर-कानूनी गिरफ्तारी पर पुलिस अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई और ₹3 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया।

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अलग कमरे में रहना अपने आप में क्रूरता नहीं

जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस एच. शांति भूषण की पीठ ने पारिवारिक अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। पारिवारिक अदालत ने मानसिक और वैवाहिक क्रूरता के आधार पर विवाह संबंध खत्म करने का फैसला दिया था। साथ ही पति को पत्नी के लिए हर महीने ₹25,000 स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उसे बरकरार रखा।

कई व्यवहार मिलकर बन सकते हैं क्रूरता का आधार

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पति-पत्नी का अलग-अलग कमरे में रहना वैवाहिक क्रूरता का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि इसके साथ लंबे समय तक लगातार विवाद, मानसिक उत्पीड़न, एक-दूसरे पर संदेह करना और आपसी भरोसा खत्म होने जैसी परिस्थितियां भी बनी रहें, तो इन सभी घटनाओं का सामूहिक प्रभाव वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है। इस मामले में दंपती की शादी 11 नवंबर 2001 को हुई थी और उनके दो बच्चे भी हैं। कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक विवादों को समग्र रूप से देखते हुए फैसला बरकरार रखा।

498-A में बरी होना शिकायत को झूठा साबित नहीं करता

मानसिक प्रताड़ना से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण बात कही कि पति के खिलाफ दर्ज भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A का आपराधिक मामला खत्म हो जाना या आरोपी का बरी हो जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पत्नी की शिकायत झूठी थी। अदालत ने माना कि वैवाहिक रिश्ते में ऐसा व्यवहार, जो लगातार मानसिक पीड़ा देता हो और पति-पत्नी के बीच विश्वास को खत्म करता हो, उसे किसी व्यक्ति से अनिश्चितकाल तक सहने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

अवैध गिरफ्तारी पर पुलिस अधिकारियों को फटकार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में कथित गैर-कानूनी गिरफ्तारी को लेकर पुलिस पर कड़ी टिप्पणी की। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने केएन मोहन रेड्डी की गिरफ्तारी के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने व्हाइटफील्ड पुलिस स्टेशन से जुड़े जांच अधिकारी सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ विभागीय जांच के निर्देश दिए। साथ ही सब-इंस्पेक्टर और उनके वरिष्ठ अधिकारियों को याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से कुल ₹3 लाख देने का आदेश दिया।

नोटिस से पहले ही कर लिया गिरफ्तार

मामले के अनुसार, रेड्डी को एक सिविल विवाद से जुड़े केस में 25 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत नोटिस जारी कर 27 अगस्त को पेश होने का निर्देश दिया था। आरोप है कि निर्धारित तारीख से करीब 48 घंटे पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह मामला 10 अगस्त को रेड्डी और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया था। कोर्ट ने गिरफ्तारी की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए पुलिस को कानून के दायरे में कार्रवाई करने की सख्त हिदायत दी। अदालत ने कहा कि कानून का शासन सर्वोपरि है और पुलिस को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नियमों के अनुसार ही करना चाहिए।

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