SIR Tribunal : जस्टिस शिवगणनम का SIR ट्रिब्यूनल से इस्तीफा, 22 दिनों में निपटाए 1777 लंबित मामले

न्यायपालिका में 'सुपरमैन' की रफ्तार! जस्टिस शिवगणनम ने इस्तीफा देने से पहले SIR ट्रिब्यूनल की सूरत बदल दी। केवल 22 कार्यदिवसों में 1777 मामलों का निपटारा कर उन्होंने सबको चौंका दिया है। क्या उनके इस्तीफे का संबंध किसी राजनीतिक दबाव से है या यह उनकी अपनी निजी इच्छा?

SIR Tribunal

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मई 8, 2026

SIR Tribunal :  कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी.एस. शिवगणनम ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ट्रिब्यूनल से अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका यह निर्णय कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि उन्होंने अपने बेहद संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान कार्यक्षमता और मानवीय दृष्टिकोण का एक अनूठा उदाहरण पेश किया। जस्टिस शिवगणनम ने अपना इस्तीफा कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और चुनाव आयोग को भेज दिया है। उनके जाने से ट्रिब्यूनल की भविष्य की कार्ययोजना पर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि लंबित मामलों की संख्या और वर्तमान गति के बीच एक बड़ी खाई है।

रिकॉर्ड समय में अपीलों का निपटारा और ‘शून्य’ रिजेक्शन

जस्टिस शिवगणनम ने ट्रिब्यूनल में कार्य करते हुए मात्र 22 दिनों (5 अप्रैल से 27 अप्रैल) के भीतर 1,777 अपीलों का सफलतापूर्वक निपटारा किया। सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उन्होंने एक भी अपील को खारिज नहीं किया। उनका मानना था कि लोकतांत्रिक अधिकारों, विशेषकर मतदान के अधिकार को बहाल करना प्राथमिकता होनी चाहिए। फराक्का से कांग्रेस उम्मीदवार मोहम्मद महताब शेख पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनके पक्ष में जस्टिस शिवगणनम ने फैसला सुनाया, जिससे उन्हें चुनाव लड़ने और अंततः विधायक बनने का अवसर मिला। इसके अलावा, उन्होंने महान चित्रकार नंदलाल बोस के पोते सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी के वोट देने के अधिकार को भी बहाल किया।

मिशनरीज ऑफ चैरिटी की ननों को दिलाया मताधिकार

जस्टिस शिवगणनम की संवेदनशीलता का परिचय तब मिला जब उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की लगभग 30 ननों की अपीलें सुनीं। हालांकि, तकनीकी रूप से ननों के वर्तमान प्रमाण पत्र उनकी दीक्षा (Ordination) से पहले के दस्तावेजों से पूरी तरह मेल नहीं खा रहे थे, फिर भी जस्टिस शिवगणनम ने लचीला रुख अपनाया। उन्होंने किसी भी अपील को खारिज करने के बजाय उन्हें मतदान की अनुमति दी। उनका मानना था कि तकनीकी कमियों की वजह से किसी भी नागरिक को उसके मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

काम का दबाव और भविष्य की चुनौतियां

इस्तीफा देते समय जस्टिस शिवगणनम ने ट्रिब्यूनल की जमीनी हकीकत पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वह प्रतिदिन सुबह 8:30 बजे से शाम 5:00 बजे तक और रविवार को बिना किसी सहायक स्टाफ के काम करते थे। उनके अनुसार, कोलकाता में अभी भी लगभग 1 लाख अपीलें लंबित हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान गति से कार्य जारी रहा, तो कोलकाता की सभी लंबित अपीलों को निपटाने में कम से कम चार साल का समय लग जाएगा। उन्होंने ऑनलाइन पोर्टल की सीमाओं और ई-कोर्ट की तकनीकी चुनौतियों का भी उल्लेख किया, जहाँ न्यायाधीशों को लंबे आदेश लिखने की आदत होती है, लेकिन पोर्टल पर शब्द सीमा के कारण उन्हें संक्षिप्त आदेश देने पड़े।

जस्टिस टी.एस. शिवगणनम का गौरवशाली सफर

16 सितंबर को जन्मे जस्टिस शिवगणनम का न्यायिक करियर अत्यंत प्रभावशाली रहा है। चेन्नई के लोयोला कॉलेज से स्नातक और मद्रास लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई करने वाले शिवगणनम साल 2000 में अतिरिक्त केंद्र सरकार स्थायी वकील नियुक्त हुए थे। उन्होंने दक्षिण रेलवे और केंद्र सरकार के वरिष्ठ पैनल वकील के रूप में भी सेवाएं दीं। 11 मई 2023 को उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। ई-कोर्ट और तकनीकी कार्यप्रणाली के जानकार होने के बावजूद, उन्होंने स्वीकार किया कि सभी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए डिजिटल बदलावों के साथ तालमेल बिठाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अब वह चेन्नई लौट रहे हैं, लेकिन उनका 22 दिनों का यह कार्यकाल भारतीय न्यायिक इतिहास में ‘स्पीड और जस्टिस’ के समन्वय के लिए याद रखा जाएगा।