India France Strategic: वर्तमान में वैश्विक भू-राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने यूरोपीय संघ के देशों, विशेषकर फ्रांस के भीतर एक असुरक्षा और असंतोष की भावना पैदा कर दी है। ट्रंप के हालिया फैसलों ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संस्थाओं की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस अनिश्चितता के बीच, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपनी कूटनीतिक दिशा को भारत की ओर मोड़ दिया है। मैक्रों का भारत के प्रति यह बढ़ता झुकाव केवल एक सामान्य द्विपक्षीय संबंध नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल पॉलिटिक्स में एक नई धुरी के निर्माण का स्पष्ट संकेत है। फ्रांस अब भारत को वैश्विक स्थिरता के लिए एक अनिवार्य शक्ति के रूप में देख रहा है।
बहुपक्षवाद (Multilateralism) का नया केंद्र: भारत की वैश्विक भूमिका
राष्ट्रपति मैक्रों ने भारत को बहुपक्षवाद (Multilateralism) का सबसे मजबूत स्तंभ बताया है। उनका मानना है कि जब दुनिया संरक्षणवाद की ओर बढ़ रही है, तब भारत ही वह देश है जो निष्पक्ष नियमों और साझा विकास में विश्वास रखता है। मैक्रों ने पिछले वर्ष आयोजित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) समिट का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति ने इस दिशा में वैश्विक विमर्श को नई ऊंचाई दी है। मैक्रों के अनुसार, भारत और फ्रांस ने मिलकर एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय ढांचा तैयार करने में सफलता पाई है, जो न केवल तकनीकी नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि वैश्विक नियम सभी के लिए समान और न्यायपूर्ण हों।
रणनीतिक साझेदारी और फरवरी का भारत दौरा: रिश्तों को मिलेगी नई धार
फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने घोषणा की है कि वे अगले महीने, यानी फरवरी में, भारत की आधिकारिक यात्रा पर आएंगे। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच सामरिक और रणनीतिक संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाना है। मैक्रों ने स्पष्ट किया कि भारत के साथ फ्रांस का रिश्ता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की चुनौतियों से निपटने की एक साझा तैयारी है। इस यात्रा के दौरान रक्षा, अंतरिक्ष और उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में बड़े समझौतों की उम्मीद की जा रही है, जो भारत-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदलने की क्षमता रखते हैं।
रेयर अर्थ मिनरल्स: भविष्य की तकनीक के लिए भारत-फ्रांस का गठजोड़
आधुनिक तकनीक और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ (दुर्लभ खनिज) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। वर्तमान में इन खनिजों की सप्लाई चेन पर कुछ खास देशों का एकाधिकार है। राष्ट्रपति मैक्रों ने जोर देकर कहा कि फ्रांस और भारत इस क्षेत्र में एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। दोनों देश मिलकर खनिजों के अन्वेषण और शोधन पर काम करेंगे ताकि भविष्य की तकनीक के लिए किसी एक शक्ति पर निर्भर न रहना पड़े। यह सहयोग न केवल भारत की आत्मनिर्भरता को बल देगा, बल्कि फ्रांस को भी एक वैकल्पिक और भरोसेमंद सप्लाई चेन मुहैया कराएगा।
नैरोबी समिट और पीएम मोदी को विशेष निमंत्रण: उद्यमिता का नया विजन
फ्रांस अब केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह वैश्विक दक्षिण (Global South) के साथ भी अपने संबंधों को विस्तार दे रहा है। इसी कड़ी में फ्रांस नैरोबी में एक भव्य शिखर सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है, जिसका केंद्र बिंदु ‘क्रांतिकारी उद्यमिता’ (Entrepreneurship) होगा। मैक्रों ने इस महत्वपूर्ण सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जर्मन चांसलर को विशेष रूप से आमंत्रित किया है। यह निमंत्रण दर्शाता है कि फ्रांस वैश्विक आर्थिक नीतियों के निर्माण में भारत की सलाह और भागीदारी को कितनी प्राथमिकता दे रहा है।
ट्रंप की नीतियों से उपजी नाराजगी: क्यों नए साथी खोज रहा है यूरोप?
मैक्रों की इस सक्रियता के पीछे डोनाल्ड ट्रंप के वे कड़े फैसले हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। ट्रंप ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की 31 संस्थाओं और 35 अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों से अमेरिका के हटने का आदेश दिया है। अमेरिका के इस अलगाववादी रुख ने फ्रांस जैसे देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे अब वाशिंगटन पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकते। ट्रंप की इन नीतियों के कारण दुनिया भर में एक शून्य पैदा हो गया है, जिसे भरने के लिए फ्रांस अब भारत जैसे लोकतांत्रिक और स्थिर राष्ट्र की ओर देख रहा है।
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