Haryana News: भारतीय न्याय व्यवस्था में कई बार न्याय मिलने में लंबा वक्त जरूर लगता है, लेकिन जब फैसला आता है, तो वह पीड़ितों के जीवन में नई उम्मीद लेकर आता है। ऐसा ही एक प्रेरणादायक मामला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से सामने आया है, जहां कोर्ट ने सेना से 1989 में डिस्चार्ज किए गए पूर्व सैनिक भूपिंदर सिंह के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार की चुनौती को खारिज कर दिया। इस फैसले के साथ ही पूर्व सैनिक को 35 साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार न्याय मिल गया है।
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क्या है पूरा मामला और कानूनी पृष्ठभूमि?
यह पूरा प्रकरण पूर्व सैनिक भूपिंदर सिंह से जुड़ा हुआ है, जिन्हें 31 जुलाई 1989 को भारतीय सेना से सेवामुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया गया था। सेना में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कुल 18 वर्ष और 215 दिनों की लंबी और निष्ठावान सेवा पूरी की थी। जब उन्होंने 29 दिसंबर 1970 को सेना जॉइन की थी, तब भर्ती के समय हुए चिकित्सकीय परीक्षण में उन्हें पूरी तरह स्वस्थ और फिट पाया गया था। उनके शरीर में किसी भी प्रकार की बीमारी का कोई रिकॉर्ड नहीं था।
हालांकि, लंबी सैन्य सेवा के दौरान उन्हें ‘इस्केमिक हार्ट डिजीज’ (हृदय रोग) जैसी गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया। इस स्वास्थ्य समस्या के चलते उन्हें सेवा से बाहर होना पड़ा। लंबे संघर्ष के बाद सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT), चंडीगढ़ ने 6 मई 2024 को फैसला सुनाते हुए उन्हें दिव्यांगता पेंशन का हकदार माना था। न्यायाधिकरण ने उनकी 20 प्रतिशत दिव्यांगता को नियमों के तहत 50 प्रतिशत तक ‘राउंड ऑफ’ (संशोधित कर बढ़ाने) करने का निर्देश दिया था। यह लाभ उन्हें 1 अगस्त 1989 यानी सेवा से डिस्चार्ज होने के ठीक अगले दिन से देने का आदेश हुआ था।
केंद्र सरकार की याचिका और कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां
सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में बीमारी को ‘न तो सैन्य सेवा के कारण और न ही सैन्य सेवा से बढ़ी हुई’ माना गया था। इसके अलावा, पेंशन के लिए लगभग 32 साल की लंबी देरी से दावा करने पर भी आपत्ति जताई गई।
मामلا जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस अमरिंदर सिंह ग्रेवाल की खंडपीठ के समक्ष आया। हाई कोर्ट ने केंद्र की दलीलों को खारिज करते हुए बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई सैनिक भर्ती के समय पूरी तरह फिट था और सेवा के दौरान उसे कोई बीमारी होती है, तो कानून के तहत यह अनुमान लगाया जाएगा कि वह बीमारी सैन्य सेवा से संबंधित है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि मेडिकल बोर्ड की बिना ठोस आधार वाली रिपोर्ट किसी पूर्व सैनिक को उसके कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया गया हवाला
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के कई पुराने और महत्वपूर्ण फैसलों का जिक्र किया। कोर्ट ने दोहराया कि भर्ती के समय बीमारी का कोई रिकॉर्ड न होने का मतलब है कि सैनिक पूरी तरह स्वस्थ था। स्वास्थ्य में बाद की गिरावट को सैन्य सेवा का परिणाम ही माना जाएगा। इसके अलावा, ‘राम अवतार मामले’ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए दिव्यांगता को 20 से 50 प्रतिशत तक राउंड ऑफ करने के लाभ को पूरी तरह वैध ठहराया गया।
अदालत ने अंत में यह स्पष्ट किया कि चूंकि भूपिंदर सिंह भर्ती के वक्त स्वस्थ थे और बीमारी सेवाकाल के दौरान सामने आई, इसलिए न्यायाधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं बनता। इसी के साथ कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर पूर्व सैनिक के हक पर मुहर लगा दी।
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