Haryana News:  हाई कोर्ट की सख्ती, जिला अदालतों में लौटेंगे 285 कानून अधिकारी

हरियाणा की जिला अदालतों में आखिर ऐसा क्या हुआ कि पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट को सख्त कदम उठाने पड़े? अदालतों में बढ़ती देरी और अभियोजन व्यवस्था की कमजोरी देखकर कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। अब 285 कानून अधिकारियों की तत्काल वापसी होगी, जिससे पूरे प्रशासनिक सिस्टम में हलचल मच गई है।

हाई कोर्ट की सख्ती

Wrriten By :

Neha Mishra

Published On :

मई 16, 2026

Haryana News: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा की जिला अदालतों में अभियोजन व्यवस्था की कमजोर स्थिति को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि प्रदेश की निचली अदालतें लंबे समय से कानून अधिकारियों की भारी कमी का सामना कर रही हैं, जिसका सीधा असर आपराधिक मामलों की सुनवाई और ट्रायल की प्रक्रिया पर पड़ रहा है। न्यायिक कार्यों में लगातार हो रही देरी को गंभीर मानते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को तुरंत कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।

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प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए अधिकारियों की होगी वापसी

मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने सरकार द्वारा प्रस्तुत हलफनामे का अध्ययन करने के बाद पाया कि बड़ी संख्या में जिला अटार्नी, डिप्टी जिला अटार्नी और सहायक जिला अटार्नी विभिन्न सरकारी विभागों, बोर्डों और निगमों में प्रतिनियुक्ति पर कार्य कर रहे हैं। अदालत ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन अधिकारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी अदालतों में अभियोजन कार्य संभालना है, उन्हें गैर-न्यायिक कार्यों में लगाया जाना न्याय व्यवस्था के हित में नहीं है।

खंडपीठ ने आदेश दिया कि ऐसे 285 कानून अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से उनकी प्रतिनियुक्ति से वापस बुलाया जाए और एक सप्ताह के भीतर जिला अदालतों में उनकी नियुक्ति सुनिश्चित की जाए।

अदालतों में बढ़ रही है मामलों की लंबित संख्या

हाई कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियोजन अधिकारियों की कमी के कारण जिला अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पर्याप्त संख्या में सरकारी वकील उपलब्ध न होने से मामलों की सुनवाई समय पर नहीं हो पा रही है। इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, बल्कि पीड़ितों और आरोपियों दोनों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ रहा है।

अदालत ने यह भी कहा कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि प्रशिक्षित अधिकारी अदालतों में मौजूद नहीं होंगे तो मुकदमों की प्रभावी पैरवी संभव नहीं हो सकेगी। इससे न्याय प्रणाली की गुणवत्ता और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होती हैं।

गैर-न्यायिक कार्यों में उपयोग पर उठे सवाल

खंडपीठ ने इस बात पर नाराजगी जताई कि प्रशिक्षित कानून अधिकारियों को प्रशासनिक और कार्यालयी कार्यों में लगाया गया है, जबकि अदालतों में उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे अधिकारियों का मुख्य कार्य अदालतों में सरकार का पक्ष रखना और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाना है, न कि विभागीय दफ्तरों में सामान्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाना। अदालत ने संकेत दिया कि यदि समय रहते आवश्यक सुधार नहीं किए गए तो न्याय व्यवस्था पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

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सरकार को एक सप्ताह का समय

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी 285 अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू की जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें एक सप्ताह के भीतर संबंधित जिला अदालतों में तैनात कर दिया जाए, ताकि लंबित मामलों की सुनवाई में तेजी लाई जा सके। अदालत के इस सख्त रुख को न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।