Haryana News: पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम में पिछले 11 वर्षों से अधिक समय से संविदा (कॉन्ट्रेक्ट) के आधार पर अपनी सेवाएं दे रहे डाटा एंट्री ऑपरेटरों के पक्ष में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने इन कर्मचारियों को बड़ी राहत प्रदान करते हुए उनके नियमितीकरण (पक्का करने) की मांग पर विचार करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने निगम के प्रबंध निदेशक (एमडी) को आदेश जारी किया है कि वे उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा हाल ही में ‘मदन सिंह बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में दिए गए फैसले को आधार बनाते हुए आगामी तीन महीने के भीतर इस पूरे विषय पर अपना अंतिम निर्णय लें।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला और 2014 की नीति की वैधता
यह आदेश भारत भूषण और अन्य कर्मचारियों द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय अदालत द्वारा पारित किया गया। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि हरियाणा सरकार द्वारा 18 जून 2014 को जारी की गई नियमितीकरण नीति, जिसे बाद में 20 जून और 28 जुलाई 2014 की आधिकारिक अधिसूचनाओं के माध्यम से और अधिक स्पष्ट किया गया था, उसे अब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) की ओर से पूरी तरह से वैध ठहराया जा चुका है।
अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति पर अपनी मुहर लगा दी है, तो ऐसी स्थिति में विभाग या निगम द्वारा किसी भी पात्र और योग्य कर्मचारी के सेवा दावों की अनदेखी या उपेक्षा बिल्कुल नहीं की जा सकती। कानूनी रूप से सभी पात्र कर्मचारी इस नीति के तहत लाभ पाने के हकदार हैं।
बिना किसी सेवा-विराम के लगातार 11 वर्षों का संघर्ष
याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए अदालत को बताया गया कि इन डाटा एंट्री ऑपरेटरों की नियुक्ति अलग-अलग तारीखों पर की गई थी। शुरुआत में इन्हें ‘हारट्रॉन’ (HARTRON) के माध्यम से सेवा में लिया गया था और बाद में सीधे विद्युत प्रसारण निगम की ओर से डाटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में नियुक्त कर दिया गया।
इन कर्मचारियों की सबसे मजबूत दलील यह थी कि वे पिछले 11 सालों से बिना किसी ‘सेवा-विराम’ (ब्रेक इन सर्विस) के, पूरी ईमानदारी और निरंतरता के साथ अपने पदों पर लगातार कार्य कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह बात दृढ़ता से रखी कि वे सरकार की 2014 की नियमितीकरण नीति में निर्धारित की गई सभी अनिवार्य शर्तों और योग्यताओं को पूरी तरह से पूरा करते हैं। इसके बावजूद, विभाग द्वारा उन्हें अब तक स्थायी सेवा के लाभों से वंचित रखा गया था, जो कि उनके अधिकारों का हनन है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम के प्रबंधन पर तय समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने का भारी दबाव है। तीन महीने की यह समय सीमा इन संविदा कर्मचारियों के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाली है। कोर्ट के इस संवेदनशील और न्यायसंगत फैसले ने न केवल याचिकाकर्ताओं के भीतर एक नई उम्मीद जगाई है, बल्कि राज्य के अन्य विभागों में कार्यरत उन हजारों संविदा कर्मचारियों के लिए भी नियमितीकरण का रास्ता साफ कर दिया है जो वर्षों से स्थायी नौकरी की आस लगाए बैठे हैं।










