Greenland Row: ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नजर का 158 साल पुराना इतिहास, ट्रंप क्यों हैं उतावले?

डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव कोई सनक नहीं, बल्कि अमेरिका की डेढ़ सदी पुरानी अधूरी हसरत है। 1867 के 'आर्कटिक मिशन' से लेकर 1946 के गुप्त प्रस्ताव तक, अमेरिका ने बार-बार डेनमार्क को करोड़ों के सोने का लालच दिया। आखिर बर्फ से ढके इस द्वीप में ऐसा कौन सा खजाना छिपा है जिसके लिए महाशक्ति बेकरार है?

Greenland Row

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 8, 2026

Greenland Row:  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को अमेरिका के अधीन लाने की इच्छा जता चुके हैं। ग्रीनलैंड की सरकार और डेनमार्क की ओर से साफ इनकार के बावजूद ट्रंप अपने रुख पर अड़े दिखाई देते हैं। कभी वे अमेरिका की सैन्य ताकत का संकेत देते हैं, तो कभी ग्रीनलैंड के नागरिकों को आर्थिक फायदे और बेहतर भविष्य का लालच देते नजर आते हैं। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड को लेकर दिलचस्पी दिखाई हो। वास्तव में, यह सोच अमेरिका की लगभग डेढ़ सदी पुरानी रणनीति का हिस्सा रही है।

ग्रीनलैंड का राजनीतिक दर्जा: क्यों है मामला संवेदनशील

ग्रीनलैंड को साल 1979 से व्यापक स्वशासन प्राप्त है, लेकिन उसकी रक्षा और विदेश नीति अब भी डेनमार्क के नियंत्रण में है। इसी वजह से ग्रीनलैंड को डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र माना जाता है। इस स्थिति के चलते कोई भी अंतरराष्ट्रीय सौदा या क्षेत्रीय बदलाव केवल ग्रीनलैंड की सहमति से नहीं, बल्कि डेनमार्क की मंजूरी से भी जुड़ा होता है। यही कारण है कि ट्रंप की बयानबाजी को कूटनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।

1867–1868: अलास्का के बाद ग्रीनलैंड पर पहली नजर

ग्रीनलैंड को हासिल करने की अमेरिकी सोच की शुरुआत 19वीं सदी में ही हो गई थी। साल 1867 में अमेरिका ने रूस से अलास्का खरीदा था। इसके तुरंत बाद तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सीवार्ड ने आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका के विस्तार की संभावना पर विचार किया। इस दौरान ग्रीनलैंड के अधिग्रहण पर भी चर्चा हुई। सीवार्ड का मानना था कि ग्रीनलैंड कोयले और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। हालांकि उस समय अमेरिकी कांग्रेस आर्कटिक के एक और क्षेत्र को खरीदने के पक्ष में नहीं थी, जिससे यह विचार आगे नहीं बढ़ सका।

1910: जमीन के बदले ग्रीनलैंड लेने की असफल कोशिश

बीसवीं सदी की शुरुआत में एक बार फिर ग्रीनलैंड अमेरिका की रणनीति में शामिल हुआ। राष्ट्रपति विलियम हॉवर्ड टैफ्ट के कार्यकाल के दौरान अमेरिकी राजनयिकों ने डेनमार्क के सामने एक अनोखा प्रस्ताव रखा। योजना यह थी कि अमेरिका डेनमार्क को कहीं और जमीन देगा और बदले में ग्रीनलैंड हासिल करेगा। लेकिन डेनमार्क ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। नतीजतन, यह योजना भी कागजों तक ही सीमित रह गई।

1946: शीत युद्ध और 100 मिलियन डॉलर का प्रस्ताव

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद और शीत युद्ध की शुरुआत के साथ ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व और बढ़ गया। साल 1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन की सरकार ने डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने के लिए 100 मिलियन डॉलर मूल्य का सोना देने की पेशकश की। उस समय ग्रीनलैंड पर अमेरिका द्वारा बनाए गए हवाई अड्डे यूरोप जाने वाले सैन्य विमानों के लिए अहम ईंधन स्टेशन के रूप में काम कर रहे थे। हालांकि डेनमार्क ने यह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया, लेकिन अमेरिका ने वहां अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखी।

आज भी कायम है अमेरिकी सैन्य मौजूदगी

डेनमार्क के इनकार के बावजूद अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपनी रणनीतिक पहुंच कभी पूरी तरह नहीं छोड़ी। आज भी ग्रीनलैंड के दूरस्थ इलाके में स्थित पिटुफिक स्पेस बेस (पूर्व में थुले एयर बेस) अमेरिका का अहम सैन्य अड्डा है। यह अमेरिकी रक्षा विभाग का दुनिया के सबसे उत्तरी सैन्य ठिकानों में से एक है और मिसाइल रक्षा प्रणाली में इसकी अहम भूमिका मानी जाती है।

ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति: अमेरिका के लिए क्यों अहम

ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति ही उसे अमेरिका के लिए बेहद आकर्षक बनाती है। यह द्वीप अटलांटिक महासागर और आर्कटिक क्षेत्र को जोड़ने वाले एक महत्वपूर्ण समुद्री और नौसैनिक मार्ग पर स्थित है। ग्रीनलैंड पर नियंत्रण से अमेरिका को आर्कटिक में एक मजबूत रणनीतिक चौकी मिल सकती है। यही वह क्षेत्र है जहां रूस, चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियां सैन्य और व्यापारिक वर्चस्व के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं।

रेयर अर्थ मिनरल्स और ऊर्जा संसाधनों का लालच

ग्रीनलैंड में दुर्लभ पृथ्वी खनिजों का विशाल भंडार मौजूद है। ये खनिज बैटरी, स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और आधुनिक तकनीक से जुड़े कई उपकरणों के लिए बेहद जरूरी हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में चीन का वैश्विक दबदबा है, लेकिन अमेरिका इस निर्भरता को कम करना चाहता है। इसके अलावा वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनलैंड के आसपास के महाद्वीपीय शेल्फ में तेल और गैस के बड़े, अब तक अप्रयुक्त भंडार हो सकते हैं।

पर्यावरण बनाम रणनीतिक हित

हालांकि डेनमार्क सरकार ने पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में रखते हुए ग्रीनलैंड में तेल और गैस के दोहन से दूरी बनाए रखी है, लेकिन अमेरिका के रणनीतिक और आर्थिक हित इस क्षेत्र में गहरी रुचि दिखाते हैं। यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर जिद केवल एक तात्कालिक बयान नहीं, बल्कि अमेरिका की सदियों पुरानी आर्कटिक रणनीति की निरंतरता के रूप में देखी जा रही है।

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