G7 Summit 2026: फ्रांस की मेजबानी में 15 से 17 जून (2026) तक एविएन शहर में आयोजित हो रहे G7 शिखर सम्मेलन में इस बार भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिख रहे हैं। हालांकि, इस समिट का आधिकारिक एजेंडा वैश्विक अर्थव्यवस्था के असंतुलन और असमानता को कम करना है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पूरे सम्मेलन पर मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) संकट और ईरान युद्ध की छाया साफ तौर पर मंडरा रही है।
इस शिखर सम्मेलन में G7 के सात मूल सदस्य देशों (कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूके और अमेरिका) के अलावा, फ्रांस ने भारत, ब्राजील, केन्या और दक्षिण कोरिया को विशेष पार्टनर देशों के रूप में आमंत्रित किया है।
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फ्रांस G7 का आधिकारिक एजेंडा बनाम जमीनी हकीकत
फ्रांस की अध्यक्षता में हो रहे इस सम्मेलन के मुख्य एजेंडे में बहुपक्षवाद को बढ़ावा देना, क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिजों) की सप्लाई चेन को मजबूत करना, ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना और संगठित अपराधों को रोकना शामिल है। इसके अलावा, वैश्विक शासन व्यवस्था के नए नियमों और ढांचों पर भी विचार-विमर्श किया जाना है।
लेकिन इन सभी गंभीर मुद्दों के बीच, राजनयिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा मध्य पूर्व के युद्ध को रोकने पर हो रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बार समिट का असली केंद्र बिंदु आधिकारिक बैठकों से इतर होने वाली रणनीतिक चर्चाएं हैं।
मिडिल ईस्ट मुद्दे पर विशेष बैठक
फ्रांस ने मध्य पूर्व के इस सुलगते संकट पर चर्चा के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मिस्र, सऊदी अरब और कतर को एक विशेष सत्र के लिए आमंत्रित किया है। उच्च राजनयिक सूत्रों के अनुसार, 16 जून (मंगलवार) को होने वाली इस महाबैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल होंगे। इस बैठक का सबसे संवेदनशील और बड़ा मुद्दा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (होर्मुज जलडमरूमध्य) की सुरक्षा है, जो वैश्विक तेल व्यापार का सबसे मुख्य मार्ग माना जाता है।
होर्मुज संकट और वैश्विक ऊर्जा का खतरा
ईरान और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण पूरी दुनिया के सामने ऊर्जा संकट (Energy Crisis) खड़ा हो गया है। वैश्विक सप्लाई चेन लगातार बाधित हो रही है, जिससे दुनिया भर में महंगाई और मालभाड़ा आसमान छू रहा है। ऐसे में वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाने के लिए होर्मुज जलमार्ग से जहाजों का मुक्त और स्वतंत्र आवागमन सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो गया है। दुनिया भर की कोशिश है कि इस क्षेत्र में युद्ध को तुरंत रोका जाए।
ट्रंप और ईरान की संभावित ‘शांति डील’ पर टिकी नजरें
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि अमेरिका और ईरान एक ऐतिहासिक शांति समझौते के बेहद करीब हैं। ईरान की ओर से भी सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। यदि 16 जून की विशेष बैठक से पहले यह डील फाइनल हो जाती है, तो राष्ट्रपति ट्रंप G7 के मंच पर शांति स्थापित करने का पूरा क्रेडिट लेते नजर आएंगे। वहीं, अगर तब तक समझौता नहीं होता है, तो G7 के इतर (Sidelines) इस डील के ब्लूप्रिंट और रूपरेखा पर गहन चर्चा की जाएगी।
पीएम मोदी का वैश्विक मंच से शांति का पैगाम
इस महामंच पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पिछले साल जहां कनाडा G7 समिट में ट्रंप के टैरिफ कार्ड की चर्चा थी, वहीं इस बार फ्रांस में पीएम मोदी का ‘शांति कार्ड’ अहम होने वाला है।
पीएम मोदी ने हमेशा रूस-यूक्रेन संकट से लेकर मिडिल ईस्ट तक हर वैश्विक मंच से यही संदेश दिया है कि “यह युग युद्ध का नहीं है”। भारत का रुख हमेशा साफ रहा है कि बड़ी से बड़ी वैश्विक समस्या का समाधान केवल कूटनीति (Diplomacy) और आपसी संवाद से ही संभव है। पूरी दुनिया को उम्मीद है कि पीएम मोदी एक बार फिर G7 के मंच से मध्य पूर्व में शांति बहाली के लिए संवाद का नया रास्ता तैयार करेंगे, जो फ्रांस के लिए भी एक बड़ी कूटनीतिक सफलता साबित होगा।
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