Supreme Court Delhi SIR : दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है। याचिका में खास तौर पर उन मतदाताओं को भेजे जा रहे नोटिस पर सवाल उठाया गया है, जिनके रिकॉर्ड में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ या ‘नो मैपिंग’ जैसी श्रेणियां दर्ज की गई हैं।
नोटिस में स्पष्ट जानकारी नहीं होने का आरोप
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं, लेकिन उन्हें यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा रहा कि उनके रिकॉर्ड में आखिर किस तरह की समस्या पाई गई है। उनका तर्क है कि केवल ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसे तकनीकी शब्द लिखे होने से आम मतदाता के लिए यह समझना मुश्किल है कि उसे किस आधार पर जवाब देना है। याचिका में कहा गया है कि इस प्रक्रिया से लाखों मतदाताओं में असमंजस और परेशानी पैदा हो रही है।

चुनाव आयोग ने प्रक्रिया का किया बचाव
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील डी.एस. नायडू ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि बूथ लेवल अधिकारी यानी BLO मतदाताओं की सहायता कर रहे हैं और उन्हें प्रक्रिया से जुड़ी आवश्यक जानकारी दी जा रही है। आयोग का पक्ष है कि मतदाताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया जा रहा है।
प्रशांत भूषण ने उठाए SIR प्रक्रिया पर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के सामने मतदाता सूची में हुए बदलावों और नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि SIR से पहले दिल्ली की मतदाता सूची में करीब 1.45 करोड़ मतदाता दर्ज थे। इसके बाद 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में लगभग 47.56 लाख नाम शामिल नहीं थे और ड्राफ्ट सूची में करीब 97 लाख मतदाता रह गए।
47 लाख नाम हटने के बाद 33 लाख को नोटिस
प्रशांत भूषण के अनुसार, ड्राफ्ट सूची में शामिल करीब 33.13 लाख मतदाताओं को भी अब नोटिस जारी किए गए हैं। इन मतदाताओं के रिकॉर्ड को ‘नो मैपिंग’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसी श्रेणियों में रखा गया है। याचिकाकर्ताओं ने सवाल किया कि इन श्रेणियों में किसी मतदाता को रखने के लिए आखिर कौन से नियम और तकनीकी मानदंड अपनाए गए हैं।

नोटिस का आधार सार्वजनिक करने की मांग
याचिका में मांग की गई है कि नोटिस पाने वाले मतदाताओं के नाम और उन्हें नोटिस जारी करने के कारण सार्वजनिक किए जाएं। इसके अलावा ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ निर्धारित करने के लिए इस्तेमाल की गई तकनीकी प्रक्रिया और नियमों की भी जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पारदर्शिता के लिए मतदाताओं को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनके रिकॉर्ड में किस आधार पर आपत्ति दर्ज हुई है।
आयोग ने ड्राफ्ट सूची से बाहर नामों पर दी जानकारी
चुनाव आयोग की ओर से बताया गया है कि ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए लोगों में ऐसे मतदाता भी शामिल हैं, जो सत्यापन के दौरान अपने पुराने पते पर नहीं मिले या दूसरी जगह स्थानांतरित हो चुके थे। इसके अलावा मृत मतदाताओं और एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होने वाले मामलों को भी अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है। अंतिम मतदाता सूची तैयार होने से पहले संबंधित प्रक्रिया के तहत दावों और आपत्तियों पर विचार किया जाना है।

कई चर्चित नामों को भी मिले नोटिस
SIR प्रक्रिया के दौरान कई प्रमुख लोगों के नाम भी नोटिस पाने वालों की सूची में सामने आने की बात कही गई है। इनमें पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व दिल्ली उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नाम बताए गए हैं। पूर्व RBI गवर्नर बिमल जालान और पूर्व वायुसेना प्रमुख एनएके ब्राउन समेत कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भी सूची में होने की जानकारी सामने आई है।
नोटिस का मतलब नाम हटना नहीं
हालांकि, किसी मतदाता को SIR का नोटिस मिलना सीधे तौर पर उसका नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का मतलब नहीं है। नोटिस मिलने के बाद संबंधित व्यक्ति को अपनी पहचान, पते और पात्रता से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। उदाहरण के तौर पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को नोटिस मिलने के बाद दस्तावेजों की जांच की गई और रिकॉर्ड सही पाए जाने के बाद उनकी पात्रता को मंजूरी दिए जाने की बात सामने आई है। अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में चुनाव आयोग के जवाब से इस पूरी प्रक्रिया को लेकर स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
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