Bashir Badr Death: मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन, PM Modi ने जताया दुख

उर्दू अदब और आधुनिक गजल के मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। उन्होंने उर्दू शायरी को आम बोलचाल का हिस्सा बनाया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्रोफेसर रहे बद्र साहब का आशियाना 1987 के मेरठ दंगों में जल गया था, जिसके बाद वे भोपाल में बस गए थे।

Bashir Badr Death

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

मई 28, 2026

Bashir Badr Death: उर्दू अदब और आधुनिक गजल के सबसे चमकदार सितारे डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की लंबी उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। बशीर बद्र साहब को गजल विधा में ठेठ, सरल और बेहद रूमानी शब्दों को पिरोने के लिए जाना जाता था। उन्होंने उर्दू शायरी को किताबी संजीदगी से निकालकर आम आदमी की बोलचाल का हिस्सा बनाया। साहित्य के क्षेत्र में उनके इसी ऐतिहासिक और अविस्मरणीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया था। उनके इस दुनिया से चले जाने की खबर से देश-विदेश में मौजूद उनके लाखों प्रशंसकों और साहित्य प्रेमियों में मायूसी और गहरे शोक की लहर दौड़ गई है।

अयोध्या से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) का सफर

डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक शहर अयोध्या में हुआ था। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा और पीएचडी की मानद उपाधि देश के मशहूर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से पूरी की थी। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने इसी प्रतिष्ठित संस्थान में उर्दू के प्रोफेसर के रूप में लंबे समय तक अपनी सेवाएं भी दीं। उन्होंने अपनी गजलों और रचनाओं के माध्यम से भाषा की रूढ़िवादिता को तोड़कर उसे बेहद लोकप्रिय बनाया।

मेरठ सांप्रदायिक दंगों का वो गहरा जख्म

दुनिया को मोहब्बत के तराने और शांति का पैगाम देने वाले बद्र साहब को जिंदगी के सफर में कई गहरे जख्म भी मिले। साल 1987 में मेरठ में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों के दौरान नफरत की आग ने उनका हंसता-खेलता आशियाना जलाकर खाक कर दिया था। इस भयानक त्रासदी में उनकी कई अनमोल और अप्रकाशित साहित्यिक रचनाएं हमेशा के लिए जलकर राख हो गईं। इस हादसे के गहरे दर्द और सदमे के बाद उन्होंने मेरठ छोड़ दिया और वे हमेशा के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आकर बस गए थे।

शिमला समझौते में गूंजी बशीर बद्र की कलम की ताकत

बशीर बद्र की लेखनी में वो जादुई ताकत थी जो दो मुल्कों के बीच की सियासी कड़वाहट और दूरियों को भी कम कर सकती थी। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दर्द पर उन्होंने जो कुछ भी लिखा, वह इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। साल 1972 में हुए ऐतिहासिक शिमला समझौते के दौरान भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो का स्वागत करते हुए कूटनीति के गलियारों में बशीर बद्र साहब का ही एक बेहद मशहूर शेर सुनाया था, जिसने दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने का काम किया था।

शायरी की दुनिया में कभी न भरा जाने वाला एक बड़ा शून्य

बशीर बद्र साहब का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उर्दू शायरी के एक पूरे दौर का अवसान है। उन्होंने आम बोलचाल के शब्दों को जिस नजाकत के साथ गजल का रूप दिया, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। उनके लिखे शेर जैसे—”उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए” आज भी हर पीढ़ी की जुबान पर रहते हैं। उनका निधन साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति है जिसे कभी नहीं भरा जा सकेगा।