Emergency 1975: 25 जून 1975 की आधी रात भारतीय इतिहास का वह पन्ना है, जो लोकतंत्र के लिए सबसे काला अध्याय माना जाता है। इसी रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देशव्यापी ‘आपातकाल’ (Emergency) की घोषणा की, जिससे रातों-रात नागरिक स्वतंत्रताएं समाप्त हो गईं, विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया और प्रेस की आवाज दबा दी गई। यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता बचाने का एक लंबा संघर्ष था।
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आपातकाल के पीछे की परिस्थितियाँ
आपातकाल की नींव इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले ने रखी थी, जिसमें 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत को अवैध घोषित कर दिया गया था। इसके साथ ही, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे व्यापक जन आंदोलन ने इंदिरा सरकार की नींव हिला दी थी। इंदिरा को न केवल विपक्ष की बढ़ती ताकत का डर था, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए सत्ता परिवर्तनों (जैसे चिली में तख्तापलट) से भी असुरक्षा महसूस हो रही थी। उन्होंने इसे देश को ‘शॉक ट्रीटमेंट’ देने का नाम दिया।
25 जून 1975: पीएम आवास पर हुई हलचल
25 जून का दिन पर्दे के पीछे हुई राजनीतिक साजिशों का गवाह था। सुबह पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय को दिल्ली बुलाया गया। प्रधानमंत्री के स्टडी रूम में घंटों देश की स्थिति पर मंथन हुआ। इंदिरा गांधी ने बिना अपने कानून मंत्री से सलाह लिए राय को संवैधानिक पहलुओं पर राय देने का जिम्मा सौंपा। दोपहर करीब ढाई बजे राय ने राय दी कि संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर आपातकाल लगाया जा सकता है।
राष्ट्रपति भवन और अधिसूचना की पटकथा
शाम के समय इंदिरा गांधी और सिद्धार्थ शंकर राय राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिले। राष्ट्रपति ने औपचारिक प्रस्ताव भेजने को कहा। आरके धवन ने दस्तावेजों को राष्ट्रपति भवन पहुँचाया। इस दौरान 1 सफदरजंग रोड पर गहमागहमी चरम पर थी। जहाँ एक ओर इंदिरा अपने रेडियो संबोधन को अंतिम रूप दे रही थीं, वहीं दूसरी ओर संजय गांधी और ओम मेहता उन नेताओं की ‘हिट लिस्ट’ तैयार करने में व्यस्त थे, जिन्हें आधी रात को गिरफ्तार किया जाना था। सिद्धार्थ शंकर राय ने जब अखबारों की बिजली काटने और अदालतें बंद करने की योजना सुनी, तो उन्होंने विरोध किया। हालांकि, इंदिरा ने उन्हें भरोसा दिलाया कि ऐसा कुछ नहीं होगा, लेकिन 26 जून की सुबह वास्तविकता कुछ और ही थी।
26 जून: गिरफ्तारियों और सेंसरशिप का दौर
अगले दिन सुबह होते-होते जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। बहादुरशाह जफर मार्ग पर अखबारों की बिजली काट दी गई ताकि कोई भी विरोध की खबर न छप सके। सुबह छह बजे हुई कैबिनेट बैठक मात्र आधे घंटे में समाप्त हो गई, जिसमें बिना किसी ठोस चर्चा या मतदान के आपातकाल पर मुहर लगा दी गई। इंदिरा गांधी का वह दौर लोकतंत्र के लिए एक कड़ा सबक बन गया, जिसे उन्होंने बाद में एक इंटरव्यू में यह कहकर परिभाषित किया कि “जब मैंने आपातकाल लगाया, तो एक कुत्ते तक ने भौंकने की हिम्मत नहीं की।”
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