Rohini Building Collapsed: देश की राजधानी दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-16 इलाके से एक बेहद दर्दनाक और स्तब्ध करने वाली घटना सामने आई है। यहां मंगलवार शाम करीब 4 बजे एक निर्माणाधीन बहुमंजिला इमारत अचानक ताश के पत्तों की तरह भरभराकर जमींदोज हो गई। इस खौफनाक कंस्ट्रक्शन हादसे के होते ही पूरे रिहायशी इलाके में धूल का गुबार छा गया और अफरा-तफरी व चीख-पुकार मच गई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हादसा इतना भयानक था कि पलक झपकते ही पूरी कंक्रीट संरचना मलबे के ढेर में तब्दील हो गई। घटना के तुरंत बाद स्थानीय प्रशासन को सूचित किया गया, जिसके बाद राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), दिल्ली फायर सर्विस (DFS) और दिल्ली पुलिस की विशेष टीमों ने मौके पर पहुंचकर युद्धस्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया है।
मृतकों का आंकड़ा बढ़कर हुआ 3
बताते चले कि, इस भीषण रोहिणी इमारत दुर्घटना में हताहतों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। शुरुआती रिपोर्टों के बाद अब आधिकारिक तौर पर पुष्टि की गई है कि इस मलबे के ढेर की चपेट में आने से 3 लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल है। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान दिल्ली फायर सर्विस के जवानों ने भारी कंक्रीट हटाकर 3 लोगों को बाहर निकाला था, जिनमें से 2 लोगों की मौके पर ही मौत हो चुकी थी और 1 व्यक्ति गंभीर रूप से जख्मी मिला। वहीं, दमकल विभाग की गाड़ियों के पहुंचने से पहले ही जागरूक स्थानीय निवासियों ने अपनी जान पर खेलकर एक शख्स को मलबे से बाहर निकाल लिया था, लेकिन अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे भी मृत घोषित कर दिया। इस तरह इस मलबे के जाल ने अब तक तीन मासूम जिंदगियों को लील लिया है।
प्रशासन का युद्धस्तर पर महारेस्क्यू ऑपरेशन
हादसे वाली जगह पर जारी लगातार मानसूनी बारिश और कंक्रीट-सरियों के भारी मलबे के बावजूद राहत और बचाव अभियान को बिना रोके चलाया जा रहा है। संकट की इस घड़ी में फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। घटनास्थल पर एनडीआरएफ के करीब 50 जांबाज कमांडो, दिल्ली फायर सर्विस के 20 अनुभवी कर्मचारी और दिल्ली पुलिस के 20 से 25 जवान मुस्तैदी से मोर्चे पर डटे हुए हैं। कंक्रीट के भारी-भरकम स्लैब को हटाने और रास्ता बनाने के लिए 8 विशालकाय जेसीबी (JCB) मशीनों को लगातार काम पर लगाया गया है। इसके साथ ही, मलबे से निकलने वाले घायलों को बिना वक्त गंवाए तत्काल चिकित्सा सुविधा देने के लिए मौके पर कई एम्बुलेंस आपातकालीन स्थिति में तैनात की गई हैं।
गोल्डन ऑवर में ‘लाइव डिटेक्टर्स’ से खोजी जा रही सांसें
बचाव दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय ‘गोल्डन ऑवर’ (Golden Hour) का है, जिसमें मलबे के नीचे दबे लोगों की जान बचाने की संभावना सबसे अधिक होती है। इसके लिए एनडीआरएफ की टीम अत्याधुनिक ‘लाइव डिटेक्टर्स’ (LIVE Detectors) और सेंसर उपकरणों का इस्तेमाल कर रही है। ये संवेदनशील उपकरण मलबे के पहाड़ों के नीचे दबे किसी भी जीवित व्यक्ति की हल्की सी धड़कन, सांस या शारीरिक हलचल को पकड़ने में सक्षम हैं। जब इन डिटेक्टर्स के जरिए स्कैनिंग की प्रक्रिया की जाती है, तब मलबे के आसपास की सभी क्रेन, मशीनें और मानवीय गतिविधियां कुछ मिनटों के लिए पूरी तरह रोक दी जाती हैं, ताकि मलबे के नीचे दबी चीख या हल्की धड़कन को साफ सुना जा सके। हालांकि, रुक-रुक कर हो रही तेज बारिश इस खोजी प्रक्रिया में बड़ी बाधा बन रही है।
चपेट में आए राहगीर और मजदूर परिवार
स्थानीय निवासी ने बताया कि यह दर्दनाक हादसा शाम करीब 4:10 बजे हुआ। उनके मुताबिक, यह बहुमंजिला इमारत पिछले करीब दो साल से बन रही थी और जब यह गिरी, तब सड़क से गुजर रहे कुछ राहगीर और पैदल यात्री भी अचानक इसकी चपेट में आ गए। वहीं, एक अन्य निवासी ने राहत की सांस लेते हुए कहा कि अगर आज इस सड़क पर साप्ताहिक ‘फ्राइडे मार्केट’ (शुक्रवार बाजार) लगा होता, तो यह आपदा सैकड़ों जिंदगियों पर भारी पड़ती क्योंकि उस समय यहाँ पैर रखने की जगह नहीं होती। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस इलाके में ज्यादातर प्रवासी मजदूर और कामकाजी परिवार रहते हैं। इसलिए इस बात की प्रबल आशंका है कि ग्राउंड फ्लोर पर काम कर रहे मजदूरों के साथ-साथ उनके छोटे बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य भी मलबे के नीचे फंसे हो सकते हैं।
अगले महीने होना था गृह प्रवेश, मलबे में तब्दील हुए सपने
चश्मदीदों के अनुसार, इस बदकिस्मत चार मंजिला इमारत का ढांचा पूरी तरह तैयार हो चुका था और इन दिनों केवल अंदरूनी फिनिशिंग और पुट्टी का काम चल रहा था। स्थानीय निवासी ने बताया कि निर्माण कार्य पूरा होने की खुशी में अगले ही महीने इस नवनिर्मित मकान में भव्य गृह प्रवेश और उद्घाटन का मुहूर्त तय किया गया था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। स्थानीय निवासी ने बताया कि हादसे के वक्त वह वहीं मौजूद थे और अमूमन इमारत के मालिक अक्सर बाहर कुर्सी डालकर बैठते थे। उन्होंने अंदेशा जताया कि निर्माण के अंतिम दौर के कारण कई दिहाड़ी मजदूर पिछले कुछ दिनों से ग्राउंड फ्लोर को ही अपना आशियाना बनाकर रह रहे थे। अनुमान के मुताबिक, अभी भी 8 से 10 लोग मलबे में फंसे हो सकते हैं, जिनकी तलाश जारी है।
लापरवाही या खराब निर्माण सामग्री?
इस भयानक हादसे के बाद अब दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्चर और नियमों के पालन पर सबसे बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है। जो इमारत लगभग पूरी तरह बनकर तैयार हो चुकी थी और जिसमें केवल फिनिशिंग का काम बाकी था, वह अचानक ताश के पत्तों की तरह कैसे ढह गई? क्या इस बहुमंजिला कंस्ट्रक्शन में घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया था या इसके स्ट्रक्चरल डिजाइन (ढांचे के नक्शे) में कोई बड़ी तकनीकी खामी थी? क्या ठेकेदार और मालिक द्वारा सुरक्षा मानकों और नागरिक नियमों को ताक पर रखा गया था? इन सभी गंभीर और तीखे सवालों के जवाब तो उच्च स्तरीय तकनीकी जांच के बाद ही साफ हो पाएंगे। फिलहाल, प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकता मलबे में फंसी हर एक सांस को सुरक्षित बाहर निकालना है।










