Death Sentence: मासूमों का सौदा करने वाले इंजीनियर और पत्नी को फांसी, जज बोले- ‘मरते दम तक लटकाओ’

उत्तर प्रदेश के झांसी में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर और उसकी पत्नी ने मासूम बच्चों को अपनी हवस और लालच का शिकार बनाया। वे बच्चों का यौन शोषण कर उनके वीडियो विदेशों में बेचते थे। कोर्ट ने इसे 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' केस मानते हुए दोनों को फांसी की सजा सुनाई है। जानिए इस खौफनाक साजिश का पर्दाफाश कैसे हुआ।

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 20, 2026

Death Sentence: उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की पॉक्सो (POCSO) कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। मासूम बच्चों का यौन शोषण करने और उनके अश्लील वीडियो बनाकर डार्क वेब पर बेचने वाले दोषी पति-पत्नी को फांसी की सजा सुनाई गई है। सिंचाई विभाग के पूर्व जूनियर इंजीनियर (JE) रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को कोर्ट ने मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी माना। जज प्रदीप कुमार मिश्रा ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि दोनों दोषियों को “मरते दम तक फंदे पर लटकाए रखा जाए।” इसके साथ ही, कोर्ट ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर प्रत्येक पीड़ित बच्चे को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है।

गरीब बच्चों को शिकार और दरिंदगी का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क

यह मामला साल 2020 का है, जब सीबीआई (CBI) ने इंटरपोल से मिली सूचना के आधार पर कार्रवाई शुरू की थी। रामभवन, जो चित्रकूट में तैनात था, अपनी पत्नी के साथ मिलकर 5 से 16 साल के करीब 50 मासूमों को अपना शिकार बनाता था। ये दोनों गरीब बच्चों को मोबाइल गेम, खिलौनों और पैसों का लालच देकर घर बुलाते थे और फिर उनके साथ कुकर्म करते थे। हद तो तब हो गई जब यह पता चला कि ये पति-पत्नी उन मासूमों के अश्लील वीडियो लैपटॉप से रिकॉर्ड करते थे और उन्हें चीन, अमेरिका, ब्राजील और अफगानिस्तान समेत 47 देशों के पेडोफाइल नेटवर्क को डार्क वेब के जरिए बेचते थे।

डार्क वेब और डिजिटल सबूत: सीबीआई की 700 पन्नों की चार्जशीट

सीबीआई ने इस घिनौने अपराध की तह तक जाने के लिए तकनीक का सहारा लिया। जांच में एक पेन ड्राइव बरामद हुई थी, जिसमें 34 बच्चों के वीडियो और 679 अश्लील फोटो मिली थीं। सीबीआई ने गिरफ्तारी के 88 दिनों के भीतर 700 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट दाखिल की थी। इसमें 74 गवाहों के बयान और ठोस डिजिटल साक्ष्य शामिल थे। रामभवन को मुख्य अपराधी के रूप में और उसकी पत्नी दुर्गावती को बच्चों के शोषण में सहयोग देने तथा गवाहों को डराने-धमकाने का दोषी पाया गया। इस दौरान प्रताड़ित हुए बच्चों की हालत इतनी खराब थी कि उनका इलाज दिल्ली एम्स (AIIMS) में कराना पड़ा।

गवाहों की बहादुरी और कोर्ट का कड़ा संदेश

ट्रायल के दौरान सीबीआई ने 4 से 42 साल की उम्र तक के गवाहों को कोर्ट में पेश किया। अभियोजन पक्ष के वकील कमल सिंह ने बताया कि इंटरपोल की इनपुट के बाद जब इन मोबाइल नंबरों को ट्रेस किया गया, तो सच्चाई सामने आई। रामभवन सरकारी पद का दुरुपयोग कर रहा था और समाज के सबसे कमजोर तबके के बच्चों को निशाना बना रहा था। कोर्ट ने इस मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (विरल से विरलतम) श्रेणी में रखते हुए कहा कि ऐसे अपराधियों के लिए समाज में कोई जगह नहीं है। यह सजा उन सभी के लिए एक कड़ा सबक है जो बच्चों की मासूमियत के साथ खिलवाड़ करते हैं।

मानवता को शर्मसार करने वाले अध्याय का अंत

शुक्रवार को आए इस फैसले से पीड़ितों के परिवारों को न्याय की उम्मीद मिली है। सरकारी सेवा में रहते हुए ऐसे कुकृत्य को अंजाम देने वाले रामभवन और उसकी सहयोगी पत्नी के खिलाफ कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी ने न्यायपालिका के प्रति विश्वास को और मजबूत किया है। 18 फरवरी को दोषी करार दिए जाने के बाद आज उन्हें दी गई फांसी की सजा एक ऐसे घिनौने अपराध का अंत है, जिसने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित करने का प्रयास किया था।

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