Dantewada Naxal Surrender: नक्सलियों की घर वापसी, दंतेवाड़ा पुलिस के सामने 63 विद्रोहियों ने डाले अपने हथियार

लाल आतंक के गढ़ में बड़ी सेंध: आखिर क्यों एक साथ 63 नक्सलियों ने चुनी आत्मसमर्पण की राह? दंतेवाड़ा के जंगलों से निकलकर जब 63 नक्सली एक साथ पुलिस लाइन पहुंचे, तो सुरक्षा बल भी हैरान रह गए। सालों तक आतंक का पर्याय रहे इन माओवादियों ने 'लोन वर्राटू' अभियान के तहत मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है। आखिर इस सामूहिक सरेंडर के पीछे की असली कहानी क्या है? जानने के लिए पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

Dantewada Naxal Surrender

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 9, 2026

Dantewada Naxal Surrender: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले से सुरक्षा बलों के लिए एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है। राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे ‘लोन वर्राटू’ (घर वापस आइए) अभियान के तहत आज एक साथ 63 नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता त्याग कर आत्मसमर्पण कर दिया है। आत्मसमर्पण करने वालों में 18 महिला नक्सली भी शामिल हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि अब नक्सली विचारधारा के भीतर भी विद्रोह और बदलाव की लहर दौड़ रही है। इसे बस्तर संभाग में नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जा रहा है।

इनामी नक्सलियों और बड़े कमांडरों का मोहभंग

इस आत्मसमर्पण की सबसे बड़ी विशेषता इसमें शामिल नक्सलियों का कद है। आत्मसमर्पण करने वाले जत्थे में पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी के सचिव मोहन कड़ती ने अपनी पत्नी के साथ पुलिस के सामने हथियार डाले हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन सभी 63 नक्सलियों पर सामूहिक रूप से 1 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित था। इतने बड़े इनामी नक्सलियों का एक साथ मुख्यधारा में लौटना नक्सली संगठन के ढांचे के लिए एक विनाशकारी झटका है। यह दर्शाता है कि संगठन के शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कैडरों के बीच अब तालमेल खत्म हो रहा है।

छत्तीसगढ़ के बाहर तक फैला ‘लोन वर्राटू’ का प्रभाव

हैरानी की बात यह है कि आत्मसमर्पण करने वाले इन नक्सलियों में केवल छत्तीसगढ़ के स्थानीय लड़ाके ही शामिल नहीं हैं, बल्कि अन्य राज्यों के नक्सली भी इस अभियान से प्रभावित होकर दंतेवाड़ा पहुंचे हैं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि छत्तीसगढ़ पुलिस और सुरक्षा बलों की रणनीति अब राज्य की सीमाओं से परे भी असर दिखा रही है। ‘लोन वर्राटू’ अभियान ने नक्सलियों के मन में यह विश्वास पैदा किया है कि मुख्यधारा में लौटने पर उन्हें न केवल सुरक्षा मिलेगी, बल्कि एक सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर भी प्राप्त होगा।

सुरक्षा बलों का बढ़ता मनोवैज्ञानिक दबाव और रणनीति

पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों और उनके सप्लाई चेन पर कड़ा प्रहार किया है। सघन तलाशी अभियानों और जंगलों के भीतर नए कैंपों की स्थापना ने नक्सलियों को बैकफुट पर धकेल दिया है। इस मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण नक्सलियों का मनोबल टूट रहा है। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि नक्सलियों के पास अब केवल दो ही रास्ते बचे हैं—या तो वे आत्मसमर्पण करें या फिर सुरक्षा बलों की कार्रवाई का सामना करें। अधिकांश नक्सली अब हिंसा की निरर्थकता को समझते हुए शांति का मार्ग चुन रहे हैं।

पुनर्वास नीति और क्षेत्र में विकास की नई उम्मीदें

सरकार की पुनर्वास नीति इन नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने में सेतु का कार्य कर रही है। आत्मसमर्पण करने वाले सभी 63 पूर्व नक्सलियों को शासन की योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता, शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएंगे। इस सामूहिक आत्मसमर्पण से न केवल दंतेवाड़ा बल्कि पूरे बस्तर क्षेत्र में भय का वातावरण कम होगा। जब बंदूकें शांत होंगी, तभी अंदरूनी गांवों तक सड़क, बिजली, स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंच पाएंगी। यह घटना छत्तीसगढ़ सरकार के ‘विकास, विश्वास और सुरक्षा’ के संकल्प को और मजबूती प्रदान करती है।

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