Chagos Islands Dispute : हिंद महासागर में स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चागोस द्वीपसमूह को लेकर ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच होने वाला ऐतिहासिक समझौता अब अधर में लटक गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समझौते से समर्थन वापस लेने के बाद ब्रिटिश सरकार को यह कड़ा फैसला लेना पड़ा है। शनिवार को ब्रिटिश अधिकारियों ने स्वीकार किया कि संसद में इस समझौते को कानूनी रूप देने के लिए लाया गया विधेयक समय सीमा के भीतर पारित नहीं हो सका, जिसके कारण यह तकनीकी रूप से समाप्त हो गया है। यह घटनाक्रम न केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ा मोड़ है, बल्कि यह ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और ट्रंप प्रशासन के बीच बढ़ते वैचारिक मतभेदों को भी उजागर करता है।
डिएगो गार्सिया का सामरिक महत्व: क्यों बदला डोनाल्ड ट्रंप का इरादा?
चागोस द्वीपसमूह का सबसे प्रमुख हिस्सा डिएगो गार्सिया द्वीप है, जहाँ अमेरिका और ब्रिटेन का एक विशाल संयुक्त सैन्य अड्डा स्थित है। शुरुआत में ट्रंप ने इस समझौते का समर्थन किया था, लेकिन जनवरी 2026 में उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे ‘बहुत बड़ी मूर्खता’ बताते हुए अपना रुख बदल लिया। ट्रंप का मानना है कि इन द्वीपों पर मॉरीशस की संप्रभुता स्वीकार करने से अमेरिका के सैन्य हितों को खतरा हो सकता है। ब्रिटिश सरकार के लिए डिएगो गार्सिया एक अनिवार्य सैन्य ठिकाना है, जिसका उपयोग वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान जैसे बड़े युद्धों में किया गया है। अब बिना अमेरिकी सहमति के इस समझौते को आगे बढ़ाना ब्रिटेन के लिए सुरक्षा जोखिम बन गया है।
समझौता ‘ठंडे बस्ते’ में: विशेषज्ञों ने बताया इसे मजबूरी का फैसला
ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय के पूर्व प्रमुख साइमन मैकडोनाल्ड के अनुसार, जब दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति का राष्ट्रपति किसी समझौते का खुलकर विरोध करे, तो ब्रिटेन के पास इसे रोकने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता अब लंबे समय के लिए ‘ठंडे बस्ते’ में चला गया है। उल्लेखनीय है कि चागोस द्वीपसमूह में 60 से अधिक छोटे द्वीप हैं, जो 1814 से ब्रिटेन के कब्जे में हैं। 1960 के दशक में ब्रिटेन ने इन द्वीपों को मॉरीशस से अलग कर दिया था, जिसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और संयुक्त राष्ट्र ने गैर-कानूनी करार दिया है।
संप्रभुता और सुरक्षा का पेच: मॉरीशस को सत्ता सौंपने पर क्यों है विरोध?
प्रस्तावित समझौते के तहत ब्रिटेन को चागोस की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपनी थी, लेकिन डिएगो गार्सिया बेस को अगले 99 वर्षों के लिए पट्टे (Lease) पर अपने पास रखना था। ब्रिटेन की विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी और ‘रिफॉर्म यूके’ जैसे राजनीतिक दलों ने इस योजना का कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि यदि मॉरीशस को इन द्वीपों का नियंत्रण मिलता है, तो हिंद महासागर में चीन और रूस जैसे देशों का हस्तक्षेप बढ़ सकता है, जो पश्चिमी देशों की समुद्री सुरक्षा के लिए घातक होगा। इन दलों ने ही ट्रंप प्रशासन को इस समझौते के खिलाफ लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई थी।
चागोसियन लोगों का संघर्ष: अपनी ही धरती पर वापसी की अधूरी हसरत
इस कूटनीतिक खेल के बीच सबसे ज्यादा प्रभावित वे स्थानीय चागोसियन लोग हैं, जिन्हें 1960 और 70 के दशक में सैन्य बेस बनाने के लिए उनके घरों से जबरन निकाल दिया गया था। आज लगभग 10,000 विस्थापित चागोसियन और उनके वंशज ब्रिटेन, मॉरीशस और सेशेल्स में निर्वासन का जीवन बिता रहे हैं। उनका आरोप है कि इस समझौते में उनसे सलाह नहीं ली गई और संप्रभुता के हस्तांतरण से उनकी अपनी मातृभूमि पर लौटने की उम्मीदें और धुंधली हो गई हैं। यह विवाद अब केवल दो देशों की सीमा का नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और वैश्विक सैन्य वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है।










