Bill Gates Solar Geoengineering: बिल गेट्स की वजह से हुई भारत में बारिश? , वैज्ञानिकों ने बताया असली कारण

भारत में हाल ही में हुई अचानक बारिश और ओलावृष्टि को सोशल मीडिया पर बिल गेट्स के 'सोलर जियोइंजीनियरिंग' प्रयोगों से जोड़ा जा रहा है। वायरल दावों में इसे 'केमट्रेल' और कृत्रिम बारिश बताया गया है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों और तथ्यों ने इसे पूरी तरह नकारते हुए इसे एक प्राकृतिक 'पश्चिमी विक्षोभ' और वायुमंडलीय दबाव का परिणाम बताया है।

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

मार्च 21, 2026

Bill Gates Solar Geoengineering: मार्च के महीने में जब उत्तर भारत भीषण गर्मी की आहट महसूस कर रहा था, तभी अचानक हुए मौसम परिवर्तन ने सबको हैरत में डाल दिया। दिल्ली-एनसीआर सहित कई राज्यों में हुई झमाझम बारिश और ओलावृष्टि ने जहां तापमान में गिरावट दर्ज की, वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ‘साजिश की थ्योरी’ का एक नया दौर शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर इस प्राकृतिक घटना को माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स के गुप्त वैज्ञानिक प्रयोगों से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसे मौसम वैज्ञानिकों ने सिरे से खारिज कर दिया है।

सोशल मीडिया पर ‘केमिकल बारिश’ का शोर

बताते चले कि, जैसे ही आसमान से ओले गिरे, फेसबुक, एक्स (ट्विटर) और व्हाट्सएप पर वीडियो की बाढ़ आ गई। इन वायरल संदेशों में दावा किया जा रहा है कि यह बारिश प्राकृतिक नहीं, बल्कि ‘आर्टिफिशियल वेदर इंजीनियरिंग’ का हिस्सा है। कई इन्फ्लुएंसर्स ‘केमट्रेल’ और ‘जहरीले रसायनों’ जैसे शब्दों का उपयोग कर जनता के बीच भय का माहौल बना रहे हैं। इन दावों के अनुसार, बिल गेट्स भारत के आसमान में छिपे तौर पर ‘केमिकल स्प्रे’ करवा रहे हैं ताकि सूरज की रोशनी को रोका जा सके। ‘मौत की बारिश’ जैसे डरावने विशेषणों के साथ फैलाई जा रही यह जानकारी वैज्ञानिक तथ्यों से कोसों दूर है, लेकिन आम नागरिकों के मन में अपनी सेहत को लेकर गहरी चिंता पैदा कर रही है।

विज्ञान की आधी-अधूरी जानकारी से उपजी अटकलें

इस पूरे विवाद के केंद्र में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का ‘SCoPEx’ (Stratospheric Controlled Perturbation Experiment) नामक एक रिसर्च प्रोजेक्ट है। दरअसल, बिल गेट्स ने इस प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता प्रदान की थी, जिसका उद्देश्य वायुमंडल में सूक्ष्म कणों के माध्यम से सूर्य की किरणों को परावर्तित कर ग्लोबल वार्मिंग को कम करना था।

हालाँकि, हकीकत यह है कि यह ‘सोलर रेडिएशन मैनेजमेंट’ का प्रयोग कभी भारत की सीमाओं में हुआ ही नहीं। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर बढ़ते विवादों और नैतिक चिंताओं के कारण इस प्रोजेक्ट को साल 2024 में आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया गया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि लोग इसी पुराने प्रोजेक्ट की जानकारी को वर्तमान की बारिश से जोड़कर भ्रम फैला रहे हैं।

पश्चिमी विक्षोभ और मौसम विज्ञान का तर्क

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इन सभी दावों को आधारहीन बताते हुए स्पष्ट किया है कि यह स्थिति पूरी तरह से एक ‘तीव्र पश्चिमी विक्षोभ’ (Active Western Disturbance) का परिणाम है। इस बार वायुमंडल में लगभग 1,000 किलोमीटर लंबी एक निम्न दबाव की रेखा (Trough Line) बनी, जिसने इस सिस्टम को असाधारण रूप से शक्तिशाली बना दिया।

इसी वायुमंडलीय हलचल के कारण मैदानी इलाकों में 60-70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से सर्द हवाएं चलीं और पारा 29 डिग्री से लुढ़क कर सीधे 19 डिग्री सेल्सियस पर आ गया। यह एक शुद्ध रूप से ‘वायुमंडलीय दबाव’ की प्रक्रिया थी, जिसमें किसी भी बाहरी या कृत्रिम हस्तक्षेप की कोई भूमिका नहीं थी।

ओलों का न पिघलना और प्लास्टिक के दावे

इंटरनेट पर कई यूज़र्स ओलों के न पिघलने को ‘प्लास्टिक’ या ‘केमिकल’ होने का प्रमाण बता रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जब ओले बड़ी मात्रा में एक साथ गिरते हैं और बादल छाए रहने के कारण जमीन का तापमान कम रहता है, तो उनके पिघलने की गति धीमी हो जाती है। यह एक ‘सामान्य ऊष्मागतिकी’ (Thermodynamics) प्रक्रिया है।

जहां तक ‘क्लाउड सीडिंग’ (Cloud Seeding) या कृत्रिम वर्षा की बात है, वह तकनीक केवल बहुत ही छोटे और सीमित क्षेत्र के लिए प्रभावी होती है। मानसून या बड़े मौसमी चक्रों को नियंत्रित करना वर्तमान विज्ञान के लिए भी संभव नहीं है। अतः, दिल्ली और आसपास की यह बारिश पूरी तरह कुदरती थी और इसे किसी भी ग्लोबल एक्सपेरिमेंट से जोड़ना महज़ एक कोरी कल्पना है।