UP Election 2027: Hardoi की हॉट सीट ‘159-बिलग्राम-मल्लावां’ का संपूर्ण चुनावी विश्लेषण

हरदोई की बिलग्राम-मल्लावां विधानसभा सीट 2027 के चुनाव में अहम सियासी केंद्र बन सकती है। 2017 में पहली बार BJP ने यहां जीत दर्ज की और 2022 में भी कब्जा बरकरार रखा। अब सवाल है कि क्या भाजपा लगातार तीसरी जीत दर्ज करेगी या समाजवादी पार्टी नए सियासी समीकरणों के साथ सीट पर वापसी करेगी।

UP Election 2027

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

सितम्बर 17, 2026

Advertisements
728x90-Kanya-Sumangla-Mission-Shakti-Digital

UP Election 2027: देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर करवट ले रही है। आगामी विधानसभा चुनावों का यह रण केवल राजनीतिक दलों की साख का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस मजबूत सामाजिक और जातीय ताने-बाने की परीक्षा भी है, जो दशकों से लखनऊ की गद्दी का रास्ता तय करता आया है।प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों का अब तक का चुनावी इतिहास गवाह है कि जब-जब यहां समीकरण बदले हैं, सत्ता के सिंहासन का चेहरा भी पूरी तरह बदल गया है।

2027 में BJP और SP के बीच मुद्दों की जंग

उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार काबिज होने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) एक बार फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विकास कार्यों, कानून-व्यवस्था और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को अपना मुख्य हथियार बना रही है। पार्टी को पूरा भरोसा है कि डबल इंजन सरकार की नीतियों के दम पर वह लगातार तीसरी बार इतिहास रचेगी। वहीं, मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) राज्य में बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी रुझान का हवाला देकर सत्ता में जोरदार वापसी का दावा कर रही है।

2027 में किसका चलेगा सियासी दांव?

एक तरफ जहां सत्ताधारी दल अपनी परंपरागत सीटों और विकास के एजेंडे के बूते विजय रथ को आगे बढ़ाने की जुगत में है, वहीं विपक्षी दल क्षेत्रीय क्षत्रपों और नए सामाजिक गठजोड़ के जरिए पुराने दुर्गों को भेदने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। पश्चिमी यूपी के जाट-मुस्लिम समीकरण से लेकर पूर्वांचल के मथने वाले पिछड़ी जातियों और दलित वोटों के आंकड़े तय करेंगे कि इस बार किस दल का सियासी तीर सटीक बैठेगा।

क्या भाजपा अपने पुराने सामाजिक आधार को सहेजकर इतिहास दोहरा पाएगी, या ‘पीडीए’ (PDA) फॉर्मूले और जातिगत जनगणना के दांव के सहारे विपक्षी खेमा बाजी मारेगा? यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की हर एक सीट के सियासी इतिहास और वहां की स्थानीय जातिगत नब्ज को टटोलकर यह समझने की कोशिश करती है कि आखिर इस बार किस पार्टी के पाले में जीत की सबसे बड़ी उम्मीद नजर आ रही है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हरदोई जिले की बिलग्राम–मल्लावां विधानसभा सीट (संख्या 159) एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील रणक्षेत्र मानी जाती है। यह सीट मिश्रिख लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर इस सीट पर अभी से सियासी पारा चढ़ने लगा है।

भौगोलिक क्षेत्र और मतदाताओं का कुल आंकड़ा

भौगोलिक स्थिति: यह विधानसभा क्षेत्र ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व समेटे हुए है। इसमें बिलग्राम और मल्लावां नगर पालिका परिषद के साथ-साथ माधोगंज, कुरसठ और गंज मुरादाबाद (आंशिक/संलग्न) जैसे महत्वपूर्ण नगर निकाय और ग्रामीण क्षेत्र शामिल हैं। यह क्षेत्र गंगा नदी के मैदानी इलाकों के करीब है, जिससे कृषि यहाँ की आजीविका का मुख्य आधार है।

कुल मतदाता:निर्वाचन आयोग के आंकड़ों और पिछले चुनावों के रुझानों के मुताबिक, इस सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या 3.80 लाख से 3.85 लाख के बीच है। इसमें पुरुष और महिला मतदाताओं के अलावा युवा मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है जो चुनावी रुख तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

जातीय समीकरण और वोटों का प्रतिशत

बिलग्राम-मल्लावां सीट पर जातियों का समीकरण बहुत ही पेचीदा और दिलचस्प है। यहां कोई भी एक अकेली जाति पूरी तरह एकतरफा असर नहीं रखती, बल्कि गठजोड़ और बहु-कोणीय मुकाबला यहां की असल पहचान है:

प्रमुख जाति / समुदायअनुमानित वोट प्रतिशत
अनुसूचित जाति (SC) (पासी, धोबी, वाल्मीकि व अन्य)लगभग 21% से 22%
मुस्लिम मतदातालगभग 15% से 16%
ब्राह्मण व सवर्ण जातियांलगभग 14% से 15%
पाल (गड़रिया) एवं बघेललगभग 11% से 12%
लोधी व शाक्य (अन्य पिछड़ा वर्ग)लगभग 10% से 11%
यादव व कुर्मीलगभग 9% से 10%
अन्य पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियांशेष प्रतिशत

2027 के चुनाव में जाति कितना बड़ा रोल अदा करेगी?

वर्ष 2027 के चुनाव में जातिगत फैक्टर सबसे बड़ा केंद्रबिंदु रहने वाला है।

अति पिछड़ों और पासी मतदाताओं की लामबंदी: चूँकि अनुसूचित जाति (विशेषकर पासी समुदाय) और ओबीसी (खासतौर पर पाल, लोधी और शाक्य) का एक बड़ा हिस्सा यहाँ हार-जीत तय करता है, सभी दल इन जातियों को साधने के लिए विशेष रणनीति बना रहे हैं।

सोशल इंजीनियरिंग: राजनीतिक दल केवल अपनी कोर वोटर जातियों के भरोसे नहीं रह सकते। जो दल सवर्ण मतों (विशेषकर ब्राह्मण) के साथ-साथ गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलितों में सेंधमारी करने में कामयाब होगा, पलड़ा उसी का भारी रहेगा।

BJP का दबदबा या SP की वापसी?

इस हाई-प्रोफाइल राजनीतिक उठापटक के बीच हरदोई जिले की महत्वपूर्ण बिलग्राम-मल्लावां (विधानसभा संख्या 159) सीट का सियासी मिजाज बेहद दिलचस्प हो चला है। कभी अलग-अलग पहचान रखने वाले बिलग्राम और मल्लावां क्षेत्र परिसीमन के बाद जब से एक हुए हैं, तब से यहां का चुनावी समीकरण उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक अहम केंद्र बन गया है। साल 2017 में पहली बार इस सीट पर कमल खिलाकर भाजपा ने अपनी मजबूत पैठ बनाई थी, जिसे पार्टी ने 2022 में भी बरकरार रखा। ऐसे में 2027 के रण में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा यहां अपनी विजय रथ को आगे बढ़ा पाएगी या सपा बाजी पलटेगी।

बिलग्राम-मल्लावां विधानसभा क्षेत्र की प्रमुख समस्याएं और जनता का दर्द

भले ही प्रदेश स्तर पर शासन के बड़े-बड़े दावे कि ‘[ए जा रहे हों, लेकिन धरातल पर बिलग्राम-मल्लावां क्षेत्र के मतदाताओं की अपनी गंभीर समस्याएं हैं, जिनसे आम जनता रोजाना दो-चार हो रही है:

  • खस्ताहाल सड़कें और यातायात व्यवस्था: क्षेत्र के कई ग्रामीण इलाकों और कस्बों को जोड़ने वाली मुख्य मार्ग आज भी बदहाल स्थिति में हैं। माधोगंज और मल्लावां जैसे क्षेत्रों के कई अंदरूनी मार्ग लंबे समय से मरम्मत का इंतजार कर रहे हैं, जिससे आवागमन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • आवारा पशुओं का आतंक: बुंदेलखंड की तरह हरदोई के इस बेल्ट में भी छुट्टा गोवंश किसानों के लिए जी का जंजाल बने हुए हैं। रात-दिन जागकर फसल की रखवाली करने के बावजूद किसानों की मेहनत मवेशियों के पाले में चली जाती है, जिससे कृषि प्रधान इस क्षेत्र के अन्नदाता बेहद आहत हैं।
  • स्वास्थ्य सेवाओं का भारी अभाव: क्षेत्र के सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आज भी उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधाओं का लाले पड़े हैं। गंभीर मरीजों या आपातकालीन स्थिति में लोगों को हरदोई जिला मुख्यालय या लखनऊ का रुख करना पड़ता है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर डॉक्टरों और दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है।
  • बेरोजगारी और रोजगारोन्मुखी उद्योगों की कमी: बिलग्राम अपनी ऐतिहासिक सिरेमिक कारीगरी और कढ़ाई के काम के लिए तथा मल्लावां अपनी हथकरघा बुनाई की पुरानी परंपरा के लिए जाना जाता है। उचित प्रोत्साहन, आधुनिक तकनीक और सरकारी मदद के अभाव में ये पारंपरिक लघु उद्योग दम तोड़ रहे हैं, जिसके कारण स्थानीय युवाओं के सामने रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। युवा वर्ग खुद को ठगा सा महसूस करता है।
  • बाढ़ और जल निकासी की समस्या: गंगा और अन्य सहायक नदियों के तटीय इलाकों में मानसूनी सीजन के दौरान बाढ़ का खतरा और जलभराव आम बात है। ग्रामीण इलाकों में जल निकासी के उचित प्रबंध न होने से थोड़ी सी बारिश में ही सड़कों पर जलभराव और कीचड़ की स्थिति बन जाती है।

पिछले चुनावों का इतिहास (2012 से 2022 तक) — किस दल ने दिखाया कितना दमखम?

वर्ष 2012 विधानसभा चुनाव (बसपा की जीत)

विजेता: बृजेश कुमार (बहुजन समाज पार्टी – BSP)

उपविजेता: कृष्ण कुमार सिंह उर्फ सतीश वर्मा (समाजवादी पार्टी – SP)

ब्यौरा: परिसीमन के बाद नए स्वरूप में आई इस सीट पर 2012 में बसपा के टिकट पर बृजेश कुमार ने जीत दर्ज की थी। सपा दूसरे स्थान पर रही थी।

वर्ष 2017 विधानसभा चुनाव (भाजपा की शानदार एंट्री)

विजेता:आशीष कुमार सिंह ‘आशू’ (भारतीय जनता पार्टी – BJP)

उपविजेता:सुभाष पाल (समाजवादी पार्टी – SP)

जीत का अंतर: 8,025 वोट

ब्यौरा: मोदी लहर के बीच भाजपा के युवा चेहरे आशीष कुमार सिंह ‘आशू’ ने यहाँ कमल खिलाया। सपा के टिकट पर लड़े सुभाष पाल ने कड़ी टक्कर दी, लेकिन भाजपा बाजी मारने में सफल रही।

वर्ष 2022 विधानसभा चुनाव (भाजपा का कब्जा बरकरार)

विजेता: आशीष कुमार सिंह ‘आशू’ (भारतीय जनता पार्टी – BJP)

उपविजेता: बृजेश कुमार वर्मा (समाजवादी पार्टी – SP)

जीत का अंतर: 24,890 वोट

ब्यौरा: कड़े मुकाबले के बावजूद मौजूदा विधायक आशीष कुमार सिंह ‘आशू’ ने अपनी जीत का दायरा बढ़ाते हुए भारी मतों से सपा प्रत्याशी बृजेश कुमार वर्मा को शिकस्त दी और लगातार दूसरी बार सीट पर कब्जा जमाया।

2027 का रण: कौन–कौन ठोकेगा ताल और क्या रहेगा सियासी समीकरण?

आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है:

  • भारतीय जनता पार्टी (BJP): भाजपा इस सीट पर अपनी जीत की ‘हैट्रिक’ लगाने के लिए पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है। पार्टी वर्तमान विधायक के कामकाज और संगठन के बूते मैदान में उतरेगी, हालांकि सत्ता विरोधी रुझान (Anti-incumbency) से पार पाना और टिकट के अन्य दावेदारों को साधना उनके लिए चुनौती होगी।
  • समाजवादी पार्टी (SP): सपा इस सीट को वापस पाने के लिए बेहद आक्रामक रुख अपना रही है। पार्टी यहाँ एम-वाई (Muslim-Yadav) समीकरण के साथ-साथ पिछड़ों और पासी मतदाताओं को जोड़ने के लिए नए सामाजिक समीकरणों पर काम कर रही है।
  • अन्य दल (BSP / ASP / Congress): बहुजन समाज पार्टी (BSP) अपने पुराने कैडर वोट को साधने के लिए नए चेहरों की तलाश में है। वहीं, आजाद समाज पार्टी (Kanshi Ram) या अन्य क्षेत्रीय दल भी यहाँ अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने की जुगत में हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय होने के आसार हैं।

निष्कर्ष और राजनीतिक समीकरण

बिलग्राम-मल्लावां विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास यह बताता है कि यहां के मतदाता केवल हवा में वोट नहीं करते, बल्कि स्थानीय विकास और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि इस कुर्मी बहुल सीट पर जातिगत समीकरण भी गहरा असर डालते हैं, लेकिन मौजूदा जनता प्रशासनिक सुस्ती और स्थानीय स्तर पर जनसमस्याओं के समाधान न होने से खफा नजर आती है।

यदि भाजपा को 2027 में अपनी जीत की हैट्रिक पूरी करनी है, तो उसे केवल योगी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के नाम पर ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर इन बुनियादी समस्याओं से जनता को निजात दिलानी होगी। वहीं, समाजवादी पार्टी के पास मौका है कि वह इन स्थानीय मुद्दों को आक्रामकता से उठाकर सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाए। आने वाला वक्त ही बताएगा कि बिलग्राम-मल्लावां का मतदाता इस बार विकास चुनेगा या बदलाव की बयार बहाएगा।