Bangladesh Elections 2026: बांग्लादेश में बड़ा खेल, अमेरिकी दूत और जमात की गुप्त मुलाकात

बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले मतदान से पहले अमेरिकी राजदूत ब्रेंट क्रिश्चियनसन की जमात-ए-इस्लामी के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान के साथ हुई मुलाकातों ने खलबली मचा दी है। वाशिंगटन का यह नया झुकाव क्या भारत के लिए बड़ा सुरक्षा खतरा बनेगा? क्या जमात के जरिए अमेरिका दक्षिण एशिया में अपनी नई बिसात बिछा रहा है?

Bangladesh Election

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 24, 2026

Bangladesh Elections 2026:  बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया है। ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ की एक सनसनीखेज रिपोर्ट के अनुसार, ढाका में तैनात एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक और कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के शीर्ष नेताओं के बीच एक गोपनीय बैठक हुई है। 1 दिसंबर 2025 को हुई इस बंद कमरे की मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल तेज कर दी है। बताया जा रहा है कि अमेरिका अब बांग्लादेश की इस विवादित पार्टी के साथ अपने संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है। यह कदम न केवल बांग्लादेश के आंतरिक लोकतंत्र को प्रभावित करेगा, बल्कि भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

चुनावी सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े: जमात बनी ‘किंगमेकर’ की दावेदार

आगामी चुनावों के मद्देनजर इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट (IRI) द्वारा कराए गए ताजा जनमत सर्वेक्षण ने सबको हैरान कर दिया है। सर्वे के अनुसार, लगभग 53% लोग जमात-ए-इस्लामी के पक्ष में दिख रहे हैं। कभी हाशिए पर रहने वाली यह पार्टी अब मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के बराबर खड़ी नजर आ रही है। अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों ने भी ऑफ-द-रिकॉर्ड बातचीत में स्वीकार किया है कि वे अब जमात की बढ़ती लोकप्रियता को नजरअंदाज नहीं कर सकते। हालांकि, आधिकारिक तौर पर दूतावास इसे महज एक ‘रूटीन संवाद’ बता रहा है, लेकिन समय और संदर्भ कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

रणनीति में बदलाव: कट्टरपंथ से ‘जन कल्याण’ की ओर जमात का सफर

जमात-ए-इस्लामी अपनी पुरानी छवि को धोने के लिए एक सोची-समझी रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी अब धार्मिक कट्टरपंथ के बजाय भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों, शिक्षा और कल्याणकारी एजेंडे पर जोर दे रही है। इस नए ‘मेकओवर’ के जरिए वह युवाओं और मध्यम वर्ग के मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में सफल रही है। लेकिन इस बदलाव के बावजूद, बांग्लादेश का अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय और उदारवादी गुट गहरे डर में हैं। उन्हें डर है कि सत्ता में आने के बाद जमात फिर से अपनी पुरानी कट्टरपंथी नीतियों को लागू कर सकती है, जिससे देश का धर्मनिरपेक्ष ढांचा कमजोर होगा।

भारत की सुरक्षा चिंताएं: ऐतिहासिक विरोध और वर्तमान चुनौतियां

भारत के लिए जमात-ए-इस्लामी का उभार किसी बड़ी कूटनीतिक चुनौती से कम नहीं है। भारत ऐतिहासिक रूप से जमात को 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोधी और पाकिस्तान समर्थक मानता रहा है। नई दिल्ली के लिए चिंता की बात यह है कि यदि जमात सत्ता के केंद्र में आती है, तो पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा और सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे फिर से गंभीर हो सकते हैं। वाशिंगटन का जमात के प्रति यह नरम रवैया भारत की ‘पड़ोस पहले’ (Neighborhood First) की नीति के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हो रहा है, जिससे दोनों लोकतांत्रिक देशों के बीच आपसी विश्वास में कमी आ सकती है।

विशेषज्ञों की राय: दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता पर गहराता संकट

साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल कुगलमैन जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों में एक स्थायी दरार पैदा कर सकता है। भारत की बांग्लादेश नीति का मुख्य आधार ही कट्टरपंथी समूहों को सत्ता से दूर रखना रहा है। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद जिस तरह से इस्लामी समूहों ने अपनी पकड़ मजबूत की है और उन्हें अब पश्चिमी देशों का परोक्ष समर्थन मिल रहा है, उससे पूरे क्षेत्र की स्थिरता दांव पर लग गई है। यह स्थिति आने वाले समय में दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकती है।

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