Bakrid 2026: भारत सहित दुनिया भर में मुसलमान आज ईद-उल-अजहा मना रहे हैं, जिसे आमतौर पर बकरीद कहा जाता है। यह इस्लाम धर्म का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है और इसे “कुर्बानी की ईद” भी कहा जाता है। इस दिन अल्लाह की राह में जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने जिल-हिज्जा की 10वीं तारीख को यह पर्व मनाया जाता है। इसका मूल संदेश त्याग, समर्पण और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास है।
Weather Update: यूपी में मौसम का यू-टर्न! आज से बारिश-आंधी का दौर, 27 जिलों में ओलावृष्टि का अलर्ट
बकरीद का इतिहास
इस पर्व का संबंध हजरत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) और उनके बेटे हजरत इस्माइल (अलैहिस्सलाम) से जुड़ा है। मान्यता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम को अपने सबसे प्यारे चीज़ की कुर्बानी देने का आदेश दिया। इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे इस्माइल को कुर्बान करने का संकल्प लिया। लेकिन अल्लाह ने उनकी नीयत और ईमानदारी को स्वीकार करते हुए जिब्रईल फरिश्ते के जरिए इस्माइल की जगह एक दुंबे (भेड़) को रख दिया। इसी घटना की याद में हर साल मुसलमान हलाल जानवरों की कुर्बानी देते हैं, जिसे “सुन्नत-ए-इब्राहिमी” कहा जाता है।
हज यात्रा से संबंध
ईद-उल-अजहा हज यात्रा के समापन का प्रतीक भी है। मक्का में हज के नियम पूरे करने के बाद, दुनिया भर के हाजी और अन्य मुसलमान इस दिन अपनी इबादत पूरी करते हैं।
त्योहार मनाने की परंपरा
इस दिन सुबह मुसलमान नए या साफ कपड़े पहनकर ईदगाह या मस्जिदों में इकट्ठा होते हैं और विशेष नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद अमन-चैन और खुशहाली की दुआ मांगी जाती है। इसके बाद बकरे, भेड़, ऊंट या अन्य हलाल जानवरों की कुर्बानी दी जाती है।
कुर्बानी का गोश्त तीन हिस्सों में बांटा जाता है:
गरीबों और जरूरतमंदों के लिए।
रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए।
अपने परिवार के लिए।
इस परंपरा से सामाजिक समानता और भाईचारे का संदेश मिलता है।
बकरीद का असली संदेश
बकरीद त्याग, समर्पण और इंसानियत का पर्व है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची इबादत वही है जिसमें इंसान अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई के बारे में सोचता है। इस दिन लोग एक-दूसरे से गले मिलकर “ईद मुबारक” कहते हैं और घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं।
Weather Update: उत्तर भारत में गर्मी पर ब्रेक! तेज हवाओं और बारिश का नया अलर्ट जारी










