Azam Khan Verdict: उत्तर प्रदेश की सियासत के सबसे चर्चित चेहरों में से एक और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान को बड़ा कानूनी झटका लगा है। रामपुर की विशेष एमपी/एमएलए मजिस्ट्रेट कोर्ट ने साल 2019 में दिए गए एक विवादित और अपमानजनक बयान के मामले में आजम खान को दोषी करार देते हुए कानून की चार अलग-अलग धाराओं के तहत दो-दो साल की सजा सुनाई है। इसके साथ ही, माननीय अदालत ने प्रत्येक धारा के अंतर्गत 5 हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया है। कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सरगर्मी तेज हो गई है।
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बीजेपी विधायक आकाश सक्सेना का तीखा हमला
अदालत का यह फैसला आने के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। रामपुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक आकाश सक्सेना ने इस फैसले का स्वागत करते हुए सपा नेता पर सीधा और तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अदालत का यह निर्णय उन सभी राजनेताओं के लिए एक बहुत बड़ा और कड़ा सबक है, जो सार्वजनिक मंचों से केवल जनता की सस्ती तालियां बटोरने के लिए सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अमर्यादित और अपमानजनक टिप्पणियां करते हैं।
आकाश सक्सेना ने आगे कहा कि ऐसे बड़बोले नेता अक्सर सत्ता के अहंकार में यह भूल जाते हैं कि जो कानून और मानदंड वे दूसरों पर लागू करते हैं, वही देश का संविधान और कानून उन पर भी उसी सख्ती से लागू होता है। उन्होंने कोर्ट के इस फैसले को न्याय व्यवस्था की जीत बताते हुए इसे अपने आप में एक ‘ऐतिहासिक फैसला’ करार दिया।
क्या था पूरा मामला? भड़काऊ भाषण और अधिकारियों का अपमान
इस पूरे कानूनी मामले की पृष्ठभूमि को समझाते हुए एडवोकेट संदीप सक्सेना ने बताया कि यह पूरा विवाद आजम खान द्वारा साल 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए एक बेहद भड़काऊ और आपत्तिजनक भाषण से जुड़ा हुआ है। इस भाषण में उन्होंने ऑन-ड्यूटी सरकारी कर्मचारियों और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ बेहद अपमानजनक और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए एमपी/एमएलए मजिस्ट्रेट कोर्ट ने आरोपी पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए चारों संबंधित धाराओं में दो-दो साल के साधारण कारावास की सजा मुकर्रर की है।
आचार संहिता का उल्लंघन और लिखित माफी के बाद भी वही आचरण
मामले की विस्तृत जानकारी देते हुए एडवोकेट स्वदेश शर्मा ने बताया कि यह घटनाक्रम साल 2019 के आम चुनाव के समय का है, जब पूरे राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी थी। उन्होंने एक महत्वपूर्ण खुलासा करते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने इससे पहले भी आजम खान के बिगड़े बोल के कारण उन पर 48 घंटे और 72 घंटे तक चुनाव प्रचार करने का प्रतिबंध लगाया था।
इतना ही नहीं, पिछले विवादों को लेकर लिखित में माफीनामा देने के बावजूद आजम खान के आचरण में कोई सुधार नहीं आया और उन्होंने रामपुर के जिला प्रशासन के अधिकारियों के खिलाफ दोबारा उसी तरह की अमर्यादित टिप्पणियां कीं। इस बार उनके इस आचरण को गंभीरता से लेते हुए सिविल लाइंस थाने में उनके खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थी।
पुख्ता वीडियो साक्ष्य और 8 सरकारी कर्मचारियों की गवाही बनी आधार
मुकदमे की जांच प्रक्रिया के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि तत्कालीन जांच अधिकारी ऋषिपाल सिंह ने मामले की गहनता से तफ्तीश करने के बाद अदालत में पुख्ता चार्जशीट दाखिल की थी। इस पूरे केस को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष (Prosecution) की ओर से अदालत के समक्ष कुल 8 गवाह पेश किए गए, और ये सभी गवाह ऑन-ड्यूटी सरकारी कर्मचारी थे, जिन्होंने घटना के प्रत्यक्षदर्शी के रूप में अपने बयान दर्ज करवाए।
इस मामले में सबसे बड़ा और अकाट्य सबूत उस भाषण का वीडियो फुटेज था। अदालत में सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष यानी आजम खान के वकीलों ने कभी भी इस वीडियो साक्ष्य की प्रामाणिकता या सत्यता को चुनौती नहीं दी। इसी पुख्ता डिजिटल और मौखिक साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आजम खान को दोषी मानते हुए दो साल के साधारण कारावास और जुर्माने की सजा का ऐलान किया है।










