Zohran Mamdani : न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने हाल ही में अपने एक बयान से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है। अमेरिका में पले-बढ़े होने के बावजूद ममदानी ने साबित कर दिया कि उनका जुड़ाव अपनी भारतीय जड़ों से आज भी उतना ही गहरा है। ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स तृतीय की वर्तमान अमेरिका यात्रा के दौरान, ममदानी ने स्पष्ट किया कि यदि उन्हें राजा से संवाद का अवसर मिला, तो वह केवल औपचारिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रहेंगे। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब उनसे पूछा गया कि वह किंग चार्ल्स से क्या कहना चाहेंगे, तो उन्होंने पारंपरिक “सॉफ्ट डिप्लोमेसी” को दरकिनार करते हुए सीधे कोहिनूर हीरे की वापसी का मुद्दा उठा दिया। ममदानी ने बिना किसी झिझक के कहा, “अगर मैं राजा से बात करता… तो मैं शायद उनसे कोहिनूर हीरा वापस करने के लिए कहूंगा।”
ममदानी का पारिवारिक इतिहास और औपनिवेशिक अतीत की याद
जोहरान ममदानी का यह रुख उनकी पृष्ठभूमि को देखते हुए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी मां, विश्व प्रसिद्ध फिल्म निर्माता मीरा नायर हैं, जिनका जन्म भारत में हुआ था। उनके पिता महमूद ममदानी हैं, और उनका परिवार युगांडा से भी जुड़ा रहा है। आमतौर पर विदेशी दौरों पर राष्ट्रप्रमुखों और राजघरानों के बीच बातचीत के नियम बेहद सख्त होते हैं, लेकिन ममदानी ने इतिहास के पन्नों को खोलकर ब्रिटेन को उसके औपनिवेशिक अतीत की याद दिला दी है। यह बयान उस समय आया जब किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला 11 सितंबर के हमलों की 25वीं बरसी के अवसर पर न्यूयॉर्क के वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पहुंचे थे। ममदानी की इस मांग ने एक बार फिर लूटी गई ऐतिहासिक विरासतों पर वैश्विक बहस छेड़ दी है।
कोहिनूर: सांस्कृतिक गौरव और शोषण का अनमोल प्रतीक
कोहिनूर केवल एक बेशकीमती पत्थर नहीं है, बल्कि यह भारत के सांस्कृतिक गौरव और औपनिवेशिक काल के दौरान हुए शोषण का एक जीवंत प्रतीक है। भारत की प्रसिद्ध कोल्लूर खदान से निकला यह हीरा मूल रूप से 186 कैरेट का था। इतिहास के उतार-चढ़ाव के बीच यह मुगलों और सिखों जैसे महान राजवंशों की शोभा बढ़ाता रहा। साल 1849 में, दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध की समाप्ति के बाद, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने महज 10 वर्ष के बालक महाराजा दलीप सिंह को ‘लाहौर की संधि’ पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया। इसी संधि के तहत यह बेशकीमती हीरा महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया था, जिसे भारतीय इतिहासकार एक कानूनी प्रक्रिया के बजाय एक जबरन वसूली के रूप में देखते हैं।
ब्रिटेन का तर्क बनाम भारतीय भावनाएं: एक अधूरा न्याय
वर्तमान में 105.6 कैरेट का यह हीरा ‘टॉवर ऑफ लंदन’ में सुरक्षित रखा गया है। भारत के लिए यह वह खजाना है जिसे कभी वापस नहीं किया गया। ममदानी का बयान करोड़ों भारतीयों की उस भावना का प्रतिनिधित्व करता है जो मानते हैं कि एक बच्चे से दबाव में कराई गई संधि की कोई नैतिक वैधता नहीं होती। ब्रिटिश सरकार का तर्क रहा है कि उन्हें यह हीरा कानूनी रूप से प्राप्त हुआ था, लेकिन भारत की दलील है कि यह औपनिवेशिक सत्ता द्वारा किए गए “धन के निष्कासन” और लूट का हिस्सा है। लंदन के संग्रहालयों में इस हीरे की मौजूदगी आज भी उस युग की याद दिलाती है जब पश्चिमी देशों ने एशियाई और अफ्रीकी देशों की संपदा पर अपना अधिकार जमाया था।
वैश्विक स्तर पर बढ़ती मांग: विरासतों की घर वापसी का समय
ममदानी की यह मांग कोई अकेली आवाज नहीं है। हाल के वर्षों में दुनिया भर के देशों ने अपनी ऐतिहासिक वस्तुओं को वापस लेने के लिए अभियान तेज कर दिया है। ग्रीस अपने ‘एल्गिन मार्बल्स’ के लिए और अफ्रीकी देश ‘बेनिन ब्रॉन्ज़’ की वापसी के लिए निरंतर दबाव बना रहे हैं। पश्चिमी देशों के संग्रहालयों पर अब अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाने का वैश्विक दबाव है। ममदानी ने न्यूयॉर्क जैसे वैश्विक मंच से कोहिनूर का मुद्दा उठाकर यह साफ कर दिया है कि इतिहास के घाव तब तक नहीं भरेंगे जब तक न्याय की प्रक्रिया पूरी नहीं होती और सांस्कृतिक विरासतों को उनके वास्तविक स्वामियों को नहीं लौटाया जाता।
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